क्या है अयातोल्लाह खमेनेई का ‘फाइनल सॉल्यूशन’

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ईरान : अली खमेनेई के लिए यह मुश्किल वक्त है. बीते तीस साल से इस्लामिक रिपब्लिक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे खमेनेई का कामकाज बढ़िया नहीं चल रहा है. अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर ईरान बिल्कुल अकेला पड़ गया है और देश के भीतर लोगों की शिकायतें बढ़ती जा रही हैं. उम्रदराज होते अयातोल्लाह के पास देश और दुनिया से कहने के लिए ज्यादा कुछ है नहीं. उनके और उनकी सरकार के उग्र तेवरों को ना तो देश में कोई बहुत भाव दे रहा है ना देश के बाहर.

इसी वजह से खमेनेई के लिए यह अच्छा रहा है कि वो लोगों के सामने एक भरोसेमंद दुश्मन को पेश कर सकें. बीते सालों में ईरान के सर्वोच्च नेता ने यह जान लिया है कि अगर कुछ काम ना आए तो वो अपने दुश्मन की तरफ कुछ ऐसे जबानी इशारे करें जो हर किसी को समझ में आ जाए. जाहिर है कि इस तरह की परिस्थितियों में इस्राएल उनके खूब काम आता रहा है.

उनकी रणनीति के लिए जर्मनी में नाजी हुकूमत का होना भी अच्छा रहा है. आज की तारीख में भी ऐसा लगता है कि अयातोल्लाह खमेनेई सामूहिक हत्यारों और युद्ध अपराधियों की सत्ता से बराबरी करने में कुछ फायदा देखते हैं. किसी स्तर पर वह हिटलर और हिमलर जैसे नाजी अपराधियों से प्रेरणा लेते हैं. फलस्तीन के प्रति समर्थन और इस्राएल का विरोध करने के लिए ईरान में शुरु किए गए कुद्स दिवस के मौके पर इस साल उन्होंने “फाइनल सॉल्यूशन” का नाम लिया. इसी “फाइनल सॉल्यूशन” यानी अंतिम समाधान का नाम लेकर नाजी सत्ता ने 60 लाख यहूदियों की हत्या की थी.

खमेनेई की वेबसाइट पर यह नाजी नारा दिख रहा है और इसे “फलस्तीन मुक्त होगा” के सपने से जोड़ा जा रहा है. जाहिर है कि इस लक्ष्य में यरुशलम की उस पवित्र भूमि पर कब्जा भी शामिल है जिसे यहूदी टेंपल माउंट और मुसलमान नोबल सैंक्चुअरी के नाम से जानते हैं. वेबसाइट पर जिस तस्वीर में नाजी नारा लिखा दिख रहा है, वहां उदाहरणों से यह समझाया गया है कि पूरी जमीन मुसलमानों लोगों के हाथ में होगी. कुद्स फोर्स के पूर्व कमांडर कासिम सुलेमानी भी इस तस्वीर में नजर आ रहे हैं. कासिम सुलेमानी की अमेरिका ने जनवरी में हत्या कर दी थी. इस तस्वीर में 1979 की ईरानी क्रांति के नेता अयातोल्लाह खोमैनी भी नजर आ रहे हैं.

ईरानी सरकार ने इसे यह कह कर दबाने की कोशिश की है कि यह पोस्टर टेंपल माउंट/नोबेल सैंक्चुअरी की जगह पर जनमत संग्रह की मांग के लिए है. उनका कहना है कि जब तक यह नहीं होता, इस्लामिक जगत इस्राएल के खिलाफ अपना प्रतिरोध जारी रखेगा. हालांकि इस छद्म लोकतांत्रिक चालों से “फाइनल सॉल्यूशन” के असल मंसूबों को नहीं छिपाया जा सकता.

21 मई को ईरान के विदेश मंत्री मोहमद जवाद जरीफ ने इससे थोड़ा पीछे हटने की कोशिश करते हुए दावा किया कि इस नारे का इस्तेमाल जनमत संग्रह के संदर्भ में किया है. उन्होंने पूछा है, “अमेरिका और पश्चिम लोकतंत्र से डर क्यों रहे हैं.” लोकतंत्र का डर: कम से कम इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता कि जवाद जरीफ को अपनी इस विडंबना का अहसास है. जिस सत्ता के वो अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधि हैं वह वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों की कतार में 173वें नंबर पर हैं. यह इंडेक्स रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स ने तैयार किया है.

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की सालाना ताजा रिपोर्ट में भी ईरान को लोकतंत्र के गढ़ के रूप में अच्छे नंबर नहीं मिले हैं. 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है, “प्रशासन ने भारी पैमाने पर अभिव्यक्ति की आजादी, संगठन और समूह बनाने के अधिकारों को दबाया है. सुरक्षा बलों ने विरोध को दबाने के लिए गैरकानूनी तरीके से बल प्रयोग कर सैकड़ों लोगों को मारा है और निरंकुश हो कर हजारों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है.” इसी तरह की जानकारियां देश में आजादी की खराब हालत के बारे में भी है.

आर्थिक रूप से भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. 2020 में महंगाई की दर के 31 फीसदी तक पहुंच जाने की आशंका है. इसके अलावा आधिकारिक रूप से बेरोजगारी की दर भी 17 फीसदी है. भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग भी नाकाम हो रही है. 2019 में ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के बनाए करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में 180 देशों की सूची में ईरान 146 नंबर पर रहा. ऐसे में ईरानी सरकार के पास अपनी ओर से दिखाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है. इसी वजह से वो “फाइनल सॉल्यूशन” का संकट बुला कर ध्यान भटका रहे हैं.

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