तिब्बती मनाते हैं दिवाली की तरह गदीनअंछू पर्व

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दीपावली का त्योहार पूरे देश में उत्साह के साथ 27 अक्टूबर को मनाने की तैयारी है। वहीं तिब्बती समुदाय इसके बदले अपने संत जेतुंगपा की याद में गदीनअंछू नामक त्योहार मनाते हंै। इस मौके पर कैंपों और घरों में दीपक जलाकर रोशनी की जाती है। इसे गमी दीपावली के रूप में स्थानीय लोग जानते हैं। इतना ही नहीं इस दिन शाम को सभी के घरों में तिब्बत में बनाया जाने वाला स्पेशल डिश भी तैयार किया जाता है। मैनपाट में तिब्बती समुदाय की संस्कृति एवं रहन सहन बाहरी लोगों को आकर्षित करता रहा है। यहां तिब्बती दीपावली का त्योहार तो नहीं मानते हैं, लेकिन हर साल दीपावली के बाद जेतुंगपा नामक एक संत की याद में गदीनअंछू नामक त्योहार मानते हैं। यह त्योहार इस साल तिब्बती कैलेंडर के हिसाब से 21 दिसंबर को मनाया जाएगा। मान्यता है कि जेंतुगपा तिब्बती धर्म के प्रचारक थे और 13वीं सदी में उन्होंने प्राण त्याग दिए थे। इस पर उनकी याद में तिब्बत सहित भारत के तिब्बती शरणार्थी अपने घरों को रोशन करते हैं और दीपक तथा मोमबत्ती जलाते हैं। इस अवसर पर कैंपों को भी आकर्षक तरीके से सजाया जाता है। तिब्बती परिवारों ने बताया कि इस खास मौके पर गरीब अमीर सभी वर्ग के तिब्बती अपने अपने घरों में एक ही प्रकार का व्यंजन बनाते हैं। इसे थूपा कहा जाता है। इसके लिए पहले मटन या सब्जियों का सूप तैयार किया जाता है। इसके बाद वेजिटेरियन सूप में आटे की रोटी जैसा बनाने के बाद उसके छोटे – छोटे टुकड़े कर उसमें डाल दिया जाता है। इसके बाद पूजा पाठ करने के बाद परिवार के साथ थूपा को पीया जाता है। साथ ही दूसरे लोगों को इसे बांटा भी जाता है। इसे नूडल भी कहा जाता है।

मैनपाट में तिब्बती समुदाय के लोग 7 कैंपों में रहते हैं। इनका यहां 400 करीब परिवार है। इस दिन सभी परिवारों के बीच भाईचारा का माहौल देखने को मिलता है और अपनी संस्कृति के तहत परिधान का उपयोग करते हैं। पारंपरिक ड्रेस हिमाचल प्रदेश, दिल्ली सहित दूसरे बड़े तिब्बती कैंपों से लाते हैं। यहां पारंपरिक ड्रेसों की सिलाई नहीं हो पाती है। शादी-विवाह में भी समुदाय के लोग वहीं से कपड़े खरीदकर लाते हैं।