भाजपा पर दबाव के लिए ‘राजनीति’, नीतीश-पासवान की होगी आज मुलाकात

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नई दिल्ली: सभी राजनीतिक दल 2019 लोकसभा चुनाव के मोड में आ गए हैं। रणनीतियों और प्लानिंग के साथ बैठकों और रैलियों का दौर भी शुरू होने लगा है। वहीं, इस सबके बीच बिहार में एनडीए के भविष्य को लेकर लड़ाई काफी दिलचस्प होती दिख रही है। यही वजह है कि बिहार की सियासी अहमियत भी बढ़ती जा रही है।

बिहार में लोकसभा की कुल 40 सीटें हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इन 40 सीटों में से एनडीए को कुल 31 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। एनडीए की 31 सीटों में बीजेपी को 22, लोजपा को 6 और रालोसपा को 3 सीटों पर जीत मिली थी. उस चुनाव में नीतीश कुमार की जेडीयू अकेले चुनावी समर में उतरी थी, जिसमें उसे महज 2 सीटें हासिल हो पाई थी।

2014 से 2018 तक देश की सियासत में काफी बदलाव आ चुके हैं। विपक्षी दलों को बीजेपी के विधानसभा चुनावों में बढ़ते प्रभाव से अपने वजूद बचाने की चिंता सताने लगी है तो सहयोगी दल भी 4 सालों के बीजेपी के साथ खट्टे-मीठे अनुभवों के मद्देनजर अब अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने लगे हैं।

लोकसभा चुनावों से पहले एनडीए में शामिल बीजेपी के कई सहयोगी एक-एक कर साथ छोड़ने लगे हैं। टीडीपी, जीतन राम मांझी की ‘हम’ और पीडीपी एनडीए से बाहर निकल चुकी हैं। वहीं, शिवसेना ने 2019 में अलग चुनाव लड़ने का ऐलान कर एनडीए की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अकाली दल ने भी राज्य सभा के उपसभापति पद पर दावेदारी ठोक कर बीजेपी की मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है।

दबाव बना रही JDU

बिहार में सहयोगी जेडीयू ने उपचुनावों की हार के बाद बीजेपी पर दबाव बनाने का अबतक कोई मौका नहीं छोड़ा है। बिहार को विशेष दर्जे की मांग हो या असम नागरिकता संशोधन विधेयक समेत पूर्वोत्तर के मुद्दे हों, किसानों का मुद्दा हो या महंगाई और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें इन सभी मुद्दों पर जेडीयू ने बीजेपी से अलग स्टैंड लिया है। इसके अलावा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जे की मांग वाले आम आदमी पार्टी के आंदोलन को भी जेडीयू ने समर्थन दिया है।

मतलब साफ है जेडीयू लोकसभा चुनावों में अपने हिस्से की सीटों की संख्या और सीटों के नामों को तय करने में अब और ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहती है। शायद यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने 12 जुलाई को पटना में नीतीश कुमार से मिल कर बातचीत करने का मन बनाया है।

JDU की डिमांड

सूत्रों की मानें तो 2019 के आम चुनाव में जेडीयू 15-16 लोकसभा सीटें चाहती है। जेडीयू इसके अलावा यूपी और झारखंड से भी 4-5 सीटें चाहती है। सियासी गलियारों में जेडीयू के आरजेडी और कांग्रेस नेताओं के साथ अंदरखाने बातचीत की खबरें भी सुर्खियों में हैं। सियासत के जानकार, इसे जेडीयू की प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा मान रहे हैं। प्रशांत किशोर की भूमिका की भी चर्चा हो रही है जो समय-समय पर पर्दे के पीछे नीतीश कुमार की सियासी अहमियत को बढ़ाने की स्ट्रेटजी तैयार कर रहे हैं।

आज पासवान से नीतीश की मुलाकात

नीतीश कुमार बीजेपी पर दबाव बरकरार रखने की रणनीति के तहत सियासत के मौसम वैज्ञानिक रामविलास पासवान को भी अपने पाले में खड़े करने की कोशिश कर रहे हैं। 8 जुलाई को जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक है। इस बैठक से पहले नीतीश कुमार आज दिल्ली में रामविलास पासवान से मुलाकात करेंगे।

माना जा रहा है कि इस बैठक में 12 जुलाई को अमित शाह से मुलाकात के दौरान सीट शेयरिंग को लेकर कैसे दबाव बनाया जाए इसकी रणनीति तय होगी। हालांकि, दूसरी तरफ रामविलास पासवान 2024 तक पीएम की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी के काबिज रहने की भविष्यवाणी भी कर रहे हैं।

सहयोगियों को एकजुट रखना बीजेपी की सियासी मजबूरी है। 2013 में नीतीश कुमार ने दिल्ली में ही जेडीयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पीएम मोदी के खिलाफ जंग का ऐलान किया था। ऐसे में बीजेपी और एनडीए के दूसरे घटक दलों की नजर दिल्ली में हो रही जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर टिक गई है। बैठक में नीतीश कुमार के भाषण से उनके भविष्य के सियासी फैसलों से भी पर्दा उठ जाएगा।

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