मोदी सरकार के सामने चल सकते हैं नीतीश कुमार ये अहम चाल

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नई दिल्ली। बिहार में विधानसभा की पांच सीटों पर हुए उपचुनाव जेडीयू के उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा. इस बीच नीतीश कुमार ने जोर दिया कि उनकी पार्टी ने पहले भी इस तरह के झटकों के बाद मजबूती के साथ वासपी की है. बता दें कि पांच विधानसभा सीटों में से चार पर जेडीयू और एक पर बीजेपी चुनाव लड़ रही थी. इसमें से जेडीयू महज एक सीट ही जीत पाई. जिन पांच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुए थे उनमें किशनगंज, सिमरी बख्तियारपुर, नाथनगर, बेहलर और दरौंदा विधानसभा सीट शामिल थे. इसमें से नाथनगर सीट पर जेडीयू ने जीत दर्ज की. किशनगंज सीट पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने जीत दर्ज की है. इसे रेखांकित करते हुए जेडीयू ने कहा कि अब राष्ट्रीय जनता दल- कांग्रेस गठबंधन को अकेले राज्य के मुसलमानों का समर्थन हासिल नहीं है.

महाराष्ट्र और हरियाणा में बीजेपी की आधी जीत का बिहार पर क्या होगा असर?

महाराष्ट्र चुनाव में इस बार बीजेपी और शिवसेना को मिलकर बहुमत तो मिल गया लेकिन इस बार का प्रदर्शन 2014 के मुकाबले काफी फीका रहा. ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ? नतीजों को पहली नजर में देखने में लगता है कि बीजेपी और शिवसेना महाराष्ट्र में बाजी मारकर ले गए. इन आंकड़ों को 2014 से मिलाकर देखेंगे तो सच्चाई कुछ और लगेगी.
2014 बीजेपी जीती थी 122 सीट
2019 में बीजेपी जीती 105 सीट
2014 में शिवसेना जीती 63 सीट
2019 में शिवसेना जीती 56 सीट
ये तब जब शिवसेना और बीजेपी 2014 में बिना गठबंधन के उतरी थी और इस बार दोनों दल चुनाव पूर्व गठबंधन के साथ उतरे थे. बता दें कि महाराष्ट्र की कुल 288 विधानसभा सीटों में बीजेपी को 105 पर जीत मिली है. वहीं सहयोगी शिवसेना को 56 सीटों पर जीत मिली है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने 54 सीटें जीती हैं जबकि कांग्रेस के खाते में 44 सीटें गई हैं. साल 2014 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 122, शिवसेना को 63, कांग्रेस को 42 और एनसीपी को 41 सीटें मिली थी. उस चुनाव में बीजेपी और शिवसेना अलग-अलग चुनाव लड़े थे. हालांकि, बाद में शिवसेना बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हो गई थी.

2014 में बीजेपी को 31 फीसदी वोट मिले थे. ये वोट प्रतिशत इस बार घटकर करीब 25 रह गया. इसी तरह शिवसेना को 2014 में 19.8 फीसदी वोट मिले थे. जो इस बार घटकर करीब 17 फीसदी रह गए. 2014 में दोनों दलों को अलग-अलग लड़ने पर करीब 50 फीसदी वोट मिले थे. जबकि दोंनोे दल इस बार साथ लड़े तो मत प्रतिशत रह गया करीब 42 फीसदी. सवाल ये कि ऐसा क्यों हुआ. बीजेपी और सहयोगी दलों में इस बात पर माथा पच्ची शुरू हो गई है.

बीजेपी-जेडीयू के आत्मविश्वास पर असर

अब बिहार में उपचुनाव के नतीजों ने जेडीयू को बीजेपी से मोलभाव करने का आत्मविश्वास कमजोर कर दिया है. हालांकि बीजेपी भी दो राज्यों के नतीजों और बिहार के उपचुनाव के नतीजों से सकते में रहेगी. उसका भी आत्मविश्वास जरा कमजोर ही रहेगा. ऐसे में जेडीयू और बीजेपी के बीच सीट बंटवारे को लेकर दरार या तकरार होने की संभावना कम होगी.

सीटों के बंटवारे के दौरान तकरार से बचेंगे दोनों दल

महाराष्ट्र में मौजूदा नतीजों की एक बड़ी वजह ये भी है कि पिछले पांच साल में बीजेपी-शिवसेना के बीच कामचलाऊ रिश्ते रहे हैं. दोनों ने एक-दूसरे के कामकाज की काफी आलोचना की है. दिलचस्प ये है कि आलोचना के बाद भी दोनों दलों ने पांच साल ना सिर्फ सत्ता में बिताए बल्कि इस बार चुनाव पूर्व गठबंधन भी किया. इसी का फायदा एनसीपी-कांग्रेस के गठबंधन ने उठाया. अब बिहार में लोकसभा चुनाव से अभी तक जेडीयू और बीजेपी के रिश्तों पर ध्यान दीजिए.. दोनों दलों के बीच सियासी तकरार करीब एक साल से चल रहा था. अभी कुछ दिन पहले अमित शाह ने कहा कि बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए सरकार चुनाव लड़ेगी. इसके बाद बिहार के बीजेपी नेताओं के बयान आने बंद हुए. महाराष्ट्र में विवाद का चुनावी असर देखकर बिहार में विवाद से दोनों दल बचेंगे.

राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट नहीं, स्थानीय मुद्दों और बेरोजगारी बड़ा मुद्दा

महाराष्ट्र और हरियाणा में अनुच्छेद 370 और राष्ट्रवाद को चुनाव में खूब भूनाने की कोशिश की गई लेकिन परिणाम मन मुताबिक नहीं आया. अब नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठा सकते हैं. इससे बीजेपी की केंद्र सरकार पर एक नैतिक दबाव बनेगा. इस मांग को मध्यवर्ग पसंद भी करेगा. वही मध्य वर्ग जो बीजेपी का कोर वोटर माना जाता है. नीतीश कुमार की रणनीति विधानसभा चुनाव में विशेष दर्जा की मांग उठाकर गेंद बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के पाले में डालने की होगी. यदि केंद्र सरकार मांग मान लेती है तो क्रेडिट नीतीश कुमार और बीजेपी दोनों को मिलेगा. यदि नहीं मानती है तो ठीकरा बीजेपी पर फूटेगा.