राम के नाम ने भाजपा को ऐतिहासिक बढ़त और लोकप्रियता दी

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भुवनेश्वर (विप्र)। राम के नाम ने एक राजनीतिक दल को लगभग अमर कर दिया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर सुप्रीमकोर्ट की मुहर लगने के बाद देश में एक और दीवाली का माहौल बन गया है। घरों में लोग घी के दीये जलाएंगे। सोशल मीडिया में राम पर भजन, सिया वर रामचंद्र की जय का उद्घोष हो रहा है। कल से ही देश का माहौल कुछ ऐसा हो रहा था कि जैसे मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होने का संकेत हो। फैसला देने वाली जजों की बेंच में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोइ के साथ ही जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस.अब्दुल नजीर इस बेंच में हैं। अस्सी के दशक के आखिरी वर्षों में शुरू हुआ आंदोलन सफल रहा। मंदिर निर्माण पर अदालती मुहर ने देश के राजनीति परिवेश में परिवर्तन के संकेत दिए हैं। इसका लाभ निश्चित ही भाजपा को मिलता दिख रहा है।

भाजपा का पैदाइश सन अस्सी की है। नेता जनसंघ से आए। 1984 के चुनाव में मात्र दो सीटें पाने वाली भाजपा आज लोकसभा में तीन सौ से ऊपर है। भाजपा से शुरू से ही अपने चुनाव घोषणा पत्र में तीन मुद्दों को प्रमुखता से रखती रही है। पहला-राम मंदिर निर्माण, दूसरा-धारा 370 खतम करना और तीसरा समान नागरिक संहिता। मंदिर निर्माण और 370 हटाने का वादा तो पूरा हो गया है अब बची समान नागरिक संहिता। सुप्रीमकोर्ट में मंदिर को लेकर हुए आज के फैसले से भाजपा राजनीतिक मैदान में 75 प्रतिशत जंग जीत ली है।

यही नहीं सुप्रीमकोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 में दिए गए उस फैसले को भी अतार्किक बताया जिसमें जमीन को तीन हिस्सों में बांटा गया था। पांच जजों की बेंच का यह फैसला बेहद संतुलित रहा। मुद्दा जमीन के टाइटल का था। मस्जिद के लिए 5 एकड़ जमीन किसी अहम स्थान देने की बात कहकर सुप्रीमकोर्ट ने मुसलमानों को निराश नहीं किया। यह फैसला भाजपा की कथित सेकुलर इमेज को मजबूती देगा। मंदिर मुद्दा हल न हो पाने के लिए भाजपा सदैव ही कांग्रेस पर प्रहार करती रही।

1984 में दो सांसद जिताने वाली भाजपा 400 सीट जीतकर आने वाली कांग्रेस की सरकार के पीएम राजीव गांधी कुछ ही माह बाद शाहबानों केस में मुस्तिल तुष्टीकरण की राजनीति के शिकार होने लगे। सेकुलर मुस्लिम के रूप में उभरे आरिफ मोहम्मद खान की शिकस्त हुई जिन्हें भाजपा हाल ही में केरल का राज्यपाल बनाया है। मुस्लिम तुष्टीकरण की शिकायत करने वाले हिंदुओं को खुश करने का तरीका कांग्रेस ने निकाला। 1986 को फैजाबाद के न्यायाधीश केएम पांडेय, ने हिंदुओं को पूजा करने के लिए बाबरी मस्जिदके ताले को खोलने का आदेश दिया। यहां पर 1949 से रामलला की मूर्ति रखी थी लेकिन पूजा पर प्रतिबंध था।

हिंदुओं को रिझाने की कांग्रेस ने बड़ी मशक्कत की पर हिंदुओं का झुकाव भाजपा की ओर होता गया। मंदिर निर्माण को एजेंडे मे रखने और आडवाणी की रथयात्रा ने भाजपा को माइलेज दिया। 1984 में दो सीटें जीतने वाली पार्टी 1989 में 85 सीटें जीतकर आई। राष्ट्रवाद का जबरदस्त उभार था। कालांतर यह राजनीतिक आंदोलन बना। भाजपा का असर कम करने के लिए ही वीपी सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दी। आडवाणी अपने भाषणों में कहा करते थे कि क्या अदालत तय करेगी कि राम का जन्म कहां हुआ था? तो आज अदालत ने ही तय कर दिया कि राम का जन्म कहां हुआ।

वास्तव में आडवाणी की रथयात्रा न ही भाजपा को राष्ट्रीय पार्टी बनाने में महती भूमिका निभायी। 1991 के मध्यावधि चुनाव में भाजपा 120 सीटें जीतकर लोकसभा पहुंची। बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के बाद भाजपा का ग्राफ गिरने लगा। जातीयता आधारित राजनीतिक दल एक होने लगे। भाजपा ने भी मंदिर मुद्दा थोड़ा पीछे ही रखा। शाइनिंग इंडिया, विकास का मुद्दा आगे लेकर बढ़ी। भाजपा आज भारत की सबसे बड़ी पार्टी ज़रूर है लेकिन आज भी विपक्ष उसके ख़िलाफ़ इल्ज़ाम लगाती है कि ये समाज को सांप्रदायिक तौर पर विभाजित करके और मंदिर मुद्दे का राजनीतिकरण करके आगे बढ़ी और सत्ता हासिल की है। पार्टी इस इल्ज़ाम को खारिज करती है। उसका कहना है कि समाज को हिन्दू-मुस्लिम के बीच नफ़रत फैलाने का असली काम कांग्रेस ने किया है। कांग्रेस ने मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया और हिन्दू समाज में जातिवाद की सियासत की।Bअब जब कि राम मंदिर के निर्माण की संभावना बनी है तो क्या भाजपा को इसकी ज़रूरत है। अब तो लोग कहने लगे हैं कि मंदिर मुद्दा भाजपा के उदय ही नहीं कांग्रेस के पतन की वजह भी बना।