गवर्नर व सीएम के सामने 71 साल में पहली बार आदिम जनजाति बोंडा के लोग 26 जनवरी को नृत्य प्रस्तुत करेंगे

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भुवनेश्वर। 71 साल बाद यानी अबकी 26 जनवरी को भुवनेश्वर के महात्मा गांधी मार्ग पर आदिम जनजाति बोंडा महिलाएं राज्यपाल और मुख्यमंत्री के साथ ही दर्शकों के सामने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत करेंगी। ये लोग ओडिशा के मलकानगिरि में बहुतायत में हैं।  बोंडा के क्षेत्रों में समुचित विकास और उन्हें मुख्य धारा से जोड़ने का सरकारी प्रयास 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस से होगा। पहली बार बोंडा भुवनेश्वर में बोंडा आदिवासी परेड में भाग लेंगे। बताते हैं कि यहां पर बोंडा महिलाएं आज भी पत्तों और पेड़ों और जानवरों की छाल पहनती है। दरअसल  अभी तक ये मानव सभ्यता से कोसों दूर हैं। गणतंत्र दिवस की परेड में बोंडा पारंपरिक परिधान और नृत्य गायन का प्रदर्शन करेंगे। ऐसा पहली बार हो रहा है। शनिवार को भी इनकी नृत्यमंडली ने महात्मा गांधी मार्ग पर रिहर्सल किया।

बोंडा आदिवासी मलकानगिरि के बीहड़, पहाड़ी क्षेत्र में विशेष रूप से पायी जाती है। इन्हें रेमो बोंडा के नाम से भी जाना जाता है। बोंडो में रेमो अर्थ है लोग होता है। बोंडा वेशभूषा इनकी संस्कृति को झलकाती है। अधोवस्त्र गले में चांदी का हार पहनती हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम की पत्नी सीता के श्राप के कारण ही ये केवल नीचे के शरीर को ही ढकती हैं। चित्रकला की कलाकृति में ये माहिर होते हैं। खेतीबारी इनका व्यवसाय है। पैटखंड इनका प्रमुख त्योहार होता है। अलौकिक शक्तियों पर विश्वास करने वाले बोंडा आदिम जनजाति की प्रमुख पृथ्वी देवी होती हैं। ये सूर्य चंद्रमा और सितारों की भी पूजा करते हैं। कीचड़, गोबर, भूसे के मकान बनाकर रहते हैं। इनके विवाह  भी रोचक होते हैं। 14 साल की लड़की का वर 28 साल का होना जरूरी है।