कोरोनाः रेड लाइट एरिया में दिखी ‘मा’ की ताकत, आयोग का फरमान जारी

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सोशल डिस्टेंसिंग को लॉकडाउन में रहा भोजन तक का संकट

आयोग ने नम्रता की याचिका पर सुनवायी की तारीख 18 की

सरकारी सुविधाएं मिलेंगी तब राशन कार्ड सबके पास होगा तब

भुवनेश्वर 2 जून। कोरोना संकट काल में देह व्यापार को आजीविका का साधन वाली दो वक्त का खाना नहीं जुटा पा रही हैं। उनके पेशे पर लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के ग्रहण से वे अब दाने-दाने को मोहताज हैं। कहने को तो आज यानी दो जून को अंतर्राष्ट्रीय सेक्स वर्कर्स अधिकार दिवस मनाया जाता है, पर कोरोना के चलते लॉकडाउन के दौरान इनकी किसी ने सुधि नहीं ली। हर साल की तरह इनके कल्याण और न्याय दिलाने के भाषण भी अबकी नहीं हुए। भुवनेश्वर के एक कोने में बस्ती में रह रहीं इन सेक्स वर्करों के लिए ‘मा’ (महिला अधिकार अभियान) संस्था वास्तव में मां के रूप में ही आई। अभियान की अध्यक्ष एवं राज्य महिला आयोग की पूर्व सदस्य नम्रता चड्ढा की एक याचिका पर राज्य मानवाधिकार आयोग ने भुवनेश्वर नगर निगम के आयुक्त को देह व्यापार में लिप्त इस बस्ती की महिलाओं तत्काल प्रभाव से भोजन पानी की व्यवस्था के निर्देश दिए। यही नहीं आयोग ने याचिका में दिए राशनकार्ड के बिंदु पर भी सकारात्मक रुख दिखाते हुए इन्हें राशन कार्ड उपलब्ध कराने पर सहमति जतायी। इसी 18 जून को आयोग ने संबंधित पक्षों को तलब किया है।

राज्य मानवाधिकार ने जारी किया आदेश

आयोग के सदस्य असीम अमिताभ दास के हस्ताक्षर से भुवनेश्वर म्युनिसिपल कमिश्नर को आदेश जारी किया गया है। आयोग के अनुसार नम्रता ने यह याचिका ई-मेल से भेजी थी। याचिका में उन्होंने भुवनेश्वर की एक अलग बस्ती में रह रही इन महिलाओं और लड़कियों की तकलीफों को उजागर किया था। नम्रता और उनके सहयोगी समाजसेवियों ने सोमवार को इस रेड लाइट एरिया में राशन आदि वितरण किया था। सेक्स वर्कर्स की अगुवायी करने वाली नागमणि राव ने उन्हें बताया कि किस तरह लॉकडाउन के दौरान समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कभी-कभी तो खाने तक को नहीं होता है।

राशनकार्ड होगा तभी तो सुविधाएं मिलेंगी

नम्रता का कहना है कि समाज का यह सर्वाधिक उपेक्षित वर्ग खाद्य, स्वास्थ, शिक्षा, आवास आदि हर सरकारी सुविधा का हकदार है। उल्लेखनीय है कि हर साल दो जून को इंटरनेशनल सेक्स वर्कर्स डे मनाया जाता है। ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ता नम्रता चड्ढा की याचिका पर ओडिशा राज्य मानवाधिकार आयोग का यह निर्देश अन्य राज्यों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के लिए एक उदाहरण साबित हो सकता है। मार्च का महीना शुरू होते ही देश में कोरोनावायरस का प्रकोप बढ़ना शुरू हुआ, तभी से इनके अड्डों में आने वाले ग्राहकों की संख्या में भी तेजी से कमी होती चली गई। इसके बाद 23 मार्च से जनता कर्फ्यू व इसके बाद सामाजिक दूरी बनाए रखने के निर्देश आए फिर तो यहां लोगों का आना पूरी तरह से बंद हो गया। सोशल डिस्टेंसिंग ने उनका जीवन मुश्किल कर दिया है। रेड लाइट एरिया इन दिनों वीरान नजर आते हैं।

देश में सेक्स वर्करों का भविष्य अनिश्चित
राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के अनुसार, भारत में लगभग 6,37,500 यौनकर्मी हैं और पांच लाख से अधिक ग्राहक दैनिक आधार पर रेड-लाइट क्षेत्रों का दौरा करते हैं। लेकिन कोरोना वायरस महामारी के चलते इनका भविष्य अंधकार में है। हालांकि कारण भी है। इस मामले में संक्रमण फैलने की दर अधिक हो सकती है, क्योंकि यौन क्रिया या संभोग के दौरान सामाजिक दूरी संभव नहीं है। संक्रमित ग्राहक लाखों अन्य नागरिकों को यह बीमारी फैला सकते हैं। येल स्कूल ऑफ मेडिसिन और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शिक्षाविदों एवं शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया कि भारत में अगर राष्ट्रव्यापी बंद खत्म भी हो जाता है तो यहां रेड-लाइट एरिया (ऐसे स्थान जहां वेश्यावृत्ति होती है) को बंद ही रखा जाना चाहिए। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ऐसा किया गया तो भारत में कोरोना वायरस के मामलों के चरम पर पहुंचने में 17 दिनों की देरी लगेगी। इसके अलावा इससे कोविड-19 के अनुमानित नए मामलों में 72 फीसदी की कमी लाई जा सकती है। ‘मॉडलिंग द इफैक्ट ऑफ कॉन्टिन्यूड क्लोजर ऑफ रेड-लाइट एरियाज ऑन कोविड-19 ट्रांसमिशन इन इंडिया’ नाम के अध्ययन में पाया गया है कि अगर राष्ट्रव्यापी बंद के बाद तक रेड लाइट एरिया को बंद रखा जाता है तो भारतीयों को कोरोनावायरस होने का बहुत कम जोखिम है।

 

फ्रांस से शुरू हुआ था आंदोलन

इंटरनेशनल सेक्स वर्कर्स डे की स्टोरी पर बताते हैं कि 1970 के दशक में फ्रांसीसी पुलिस ने सेक्सवर्करों को गुप्त रूप से काम करने के लिए मजबूर किया था। लेकिन पुलिस इसे ज्यादा दिन तक दबाकर नहीं रख पायी। नतीजा ये निकला इस वर्ग की सुरक्षा में भारी कमी आई। उनके खिलाफ पहले से ज्यादा हिंसा हुई। दो जून 1975 को सेक्स वर्करों ने अपने अमानवीय  कामकाजी परिस्थितियों पर ध्यानआकर्षित करने के लिए फ्रांस के ल्योन में सेंट-निजियर चर्च पर कब्जा कर लिया और हड़ताल की। उनकी मांग थी कि सरकार में काम करने की अच्छी स्थिति और सेक्स वर्कर का सामाजिक कलंक समाप्त करने की मांग की। इनके आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार को पुलिस बल का सहारा लेना पड़ा। पुलिस को चर्चा खाली कराने में आठ दिन लगे थे पर इसने वैश्विक रूप ले लिया था। इसके बाद ही इंटरनेशनल सेक्सवर्कर्स राइट डे योरोप और दुनिया भर में मनाया जाने लगा।

(लीड फोटो कोलकाता के सोनागाछी का है)

 

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