क्या देश के विभाजन के लिए गांधी जिम्मेदार थे?

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नई दिल्ली। दुनियाभर में भारत को बापू की वजह से जाना जाता रहा है। सत्य और अहिंसा के जो महान आदर्श उन्होंने कायम किए उनकी जरूरत आज भी उतनी ही बनी हुई है, फिर भी महात्मा के जीवन और काम को समझने की जद्दोजहद आज तक खत्म नहीं हुई। लिहाजा कई लोग समय-समय पर सवाल उठाते रहते हैं और गलतफहमियां बनी रहती हैं। यहां देश के कुछ जाने-माने गांधीवादी विचारकों ने उन सवालों का जवाब दिया है…

कुमार प्रशांत (निदेशक, गांधी पीस फाउंडेशन)
जिस वक्त (वर्ष 1946) गांधी नोआखली में सांप्रदायिक सद्भाव बनाने की कोशिश कर रहे थे, उस समय उनके आसपास रहने वाले तमाम बड़े राजनीतिक चेहरे दिल्ली में लॉर्ड माउंटबेटन के साथ बैठकर भारत की आजादी को अंजाम देने में लगे थे। गांधी जब तक दिल्ली लौटते हैं, माउंटबेटन ने आजादी के साथ-साथ देश के बंटवारे की सारी गोटियां बैठा दी थीं। गांधी को आभास तो था कि उनकी पीठ पीछे कुछ हुआ है, क्योंकि अब सरदार, जवाहर और मौलाना तीनों का व्यवहार कुछ बदल गया है। कोई उनसे खुलकर कुछ नहीं बताता। साम्राज्यवाद की किलाबंदी पूरी हो चुकी थी और यहां गांधी की जरूरत किसी को नहीं थी। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच बंटवारे की सहमति बन चुकी है, जिसपर कांग्रेस की ओर से मौलाना, लीग की ओर से जिन्ना और अंग्रेजों की ओर से माउंटबेटेन साइन करते हैं। इसके बावजूद गांधी विभाजन को रोकने की कोशिश में हार नहीं मानते। गांधी माउंटबेटन से मुलाकात कर कहते हैं कि आप लोगों ने जो भी तय किया है वह ठीक है, लेकिन मेरा सिर्फ इतना निवेदन है कि आप इस काम में जल्दबाजी न करें। माउंटबेटन गांधी को जवाब देते हैं कि मैं किसी जल्दबाजी में नहीं हूं, मुझे एक कैलेंडर दिया गया है, जिसके भीतर मुझे काम करना है। इसके बाद गांधी जिन्ना से मिलते हैं और कहते हैं कि तुम किस बात के लिए परेशान हो रहे हो, तुम पाकिस्तान चाहते हो, वह तुम्हें मिल जाएगा। लेकिन पहले इन अंग्रेजों को बाहर जाने दो। इन्हें बीच में मत डालो। जिन्ना का जवाब होता है कि अंग्रेज हैं तभी तो मेरे पाकिस्तान की गारंटी है। वे चले गए तो पता नहीं आप लोग क्या करेंगे। गांधी अब पटेल और जवाहर से मिलते हैं और उनसे कहते हैं कि विभाजन रोकने का एक अच्छा विचार मेरे पास है कि तुम लोग जाकर माउंटबेटेन से कहो कि आप भारत की आजादी का ऐलान कीजिए और देश की बागडोर जिन्ना को दे दीजिए। तुम दोनों जिन्ना से कहो कि आप पीएम बन जाइए, हम आपका समर्थन करेंगे। इस पर सरदार गांधी से कहते हैं – बापू आप कह रहे हैं तो हम आपकी बात नहीं काटेंगे। लेकिन यह बात देश को आपको बतानी होगी। उसके बाद देश में जो विद्रोह होगा, उसका मुकाबला हम नहीं कर पाएंगे। यह काम आपको खुद करना होगा। तब गांधी नए-नए बने अपने उन समाजवादी शिष्यों राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी की ओर देखते हैं, जो कांग्रेसी विचारधारा के विरोधी होने के बावजूद आजादी की इस लड़ाई के चलते उनके करीब आए थे। गांधी उनसे कहते हैं कि अगर आप लोग मेरा साथ दें तो मैं जान की बाजी लगा सकता हूं, लेकिन वहां से भी उन्हें कोई सहयोग नहीं मिलता। अब गांधी के सामने विभाजन को रोकने का कोई विकल्प नहीं था। बंटवारे के बाद भी गांधी ने दोनों देशों के बीच इस बंटवारे को रोकने की कोशिश की। गांधी का कहना था कि वह बिना वीजा और पासपोर्ट के पाकिस्तान जाएंगे, जिससे वह भारत पाक विभाजन की वैधानिकता और राजनीतिक सीमा को तोड़ सकें। उनकी सोच थी कि दोनों देश अपनी-अपनी जगह रहें, लेकिन दोनों देशों के लोग बिना किसी रोक-टोक के एक दूसरे के यहां आ-जा सकें। इस सिलसिले में उन्होंने अपने दो विश्वसनीय सहयोगियों को जिन्ना से मिलने पाकिस्तान भेजा, लेकिन इससे पहले कि वे दोनों लोग जिन्ना का संदेश लेकर लौट पाते, गांधी की हत्या हो जाती है और गांधी की इच्छा अधूरी रह जाती है।