फिर से ठुंगा (ठोंगा) आ रहा है वापस

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भुवनेश्वर.- गांधी जयन्ती से राज्य भरमें प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाये जाने के बाद राज्य भरमें फिर से चिर परिचित ठुंगा का परिचलन होने लगा है। दुकानदार अब ग्राहकों को पालिथीन में सामान नहीं दे रहे हैं, कागज के ठुंगा में दे रहे हैं। महिला व शिशु विकास केन्द्र के समाजसेवी सदाशीव स्वाइ का मानना है कि इससे तीन फायदे हो रहे हैं,- एक तो ठुंगा उद्योग को बढावा मिलने से कई गरीब लोगों को काम मिलने लगा है, दूसरा पुराने अखवारों के दाम बढने लगे है, तीसरे में प्रकृति की सुरक्षा व पालिथीन खाकर मौत के मुह में जाने वाले मवेशियों का जान बचने का सम्भावना देखने लगा है।

एक जिले में २५००० ठुंगा कारीगर
जगतसिंहपुर जिले में इस समय २५००० ठुंगा कारीगर ठुगा बनाने में लगे हुए हैं। ठुंगा उद्योग का एक खासीयत यह है कि इसमें ज्यादा पूंजि लगाने की जरूरत नहीं है। पुराना पेपर ओर गोंद, बाकी कारीगरी। स्थानीय डीडीके बस्ती की रमा पाल कहती है उन्हे एक ठुंगा बेचने पर २ रूपये मिलते हैं इसलिए दूसरे काम के तुलना में ठुंगा बनाने में अच्छा फायदा है। जगतसिंहपुर के जिला सप्लाई व मर्केटिंग सोसाइटी (डीएसएमएस) के सत्य सुन्दर पाईटाल का कहना है कि ठुंगा उद्योग जिस तरह बढ रहा है उससे अब जिले के डीआडीए की ओरसे इस उद्योग को आर्थीक सहायता देने के लिए भी बात चलने लगी है।

बैग से रोजगार
एक स्वयंसेवी संगठन चेस्टा ने कपडे के बैग के अधिक प्रचलन के लिए झोपडपट्टी में रह रही महिलाओंको कपड़ा बैग बनाने का प्रशिक्षण दिया। इसमें स्थानीय शिखर चंडी वस्ती के ४० महिलाओंने प्रशिक्षण के बाद बस्ती के लोगों के पुराने कपड़े को लेकर, उसे साफ करके बैग बनाना शुरू किया है। बैग का डिजाइन के लिए वह इंटरनेट का सहारा ले रहे हैं। अब एक महिला दिन में १० तक बैग तेयार कर लेते हैं। एक बैग के लिए उन्हे १० से २० रूपये तक मजदूरी मिलती है। संस्था के परियोजना संयोजक विद्याधर बेहेरा के मुताबिक अब समय आ गया है कि हम विश्व को प्लास्टिक व पालिथीन से सुरक्षा दें। बैहेरा के मुताबिक ठुंगा या कपडे से बने बैग का प्रचलन पहले भी था। यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन प्लास्टिक व पालिथीन की अत्यधिक प्रचलन की इस पारम्परिक अभ्यास ठप हो गया। अब इसको फिर से चलाना है।