कर्नाटक में चल रहा है बिना नियम का खेल

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कर्नाटक में सबसे बड़े विधायक दल के नेता बीएस येदुरप्पा ने कल एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले तो ली थी और शपथ लेते ही उन्होंने अपना काम भी शुरू कर दिया था। येदियुरप्पा ने किसानों का एक लाख रुपये तक का कर्ज माफ करने की घोषणा की और साथ ही उन्होंने राज्य के चार आईपीएस अधिकारियों के तबादला का ऑर्डर भी जारी कर दिया, लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ये मामला कुछ डगमगाया हुआ सा लग रहा है। दो दावेदारों के बीच कर्नाटक की सत्ता उलझ के रह गयी है। दोनों ही अपने-अपने बहुमत साबित करने का दावा करने में लगे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार जहां येदुरप्पा को 15 दिनों का समय दिया गया था वहीं कर्नाटक विधानसभा में शनिवार शाम चार बजे बहुमत साबित किया जाए ताकि यह पता लगाया जा सके कि बीजेपी के नव नियुक्त मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के पास राज्य में विधायकों का पर्याप्त संख्याबल है या नहीं।

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कर्नाटक में बिना नियमों का खेल

वैसे अगर देखा जाए तो कर्नाटक में हो क्या रहा है। विधानसभा चुनाव के बाद भी जनता को अपना नेता नहीं मिल पा रहा है। सियायत के भमरजाल में फंस के रह गये है सब। ऐसा लग रहा है मानों कि वहां बिना नियमों का कोई खेल चल रहा हो। ये जो खंडित जनादेश राजनौतिक दलों किस तरह मनमानी करने का मौका मिल रहा है। इसी की ही तरह कुछ देखने को मिल रहा है कर्नाटक का राजनैतिक परिदृश्य। कर्नाटक में जनता का जो भी फैसला आया है उसमें तो किसी भी पार्टी के लिए ये मुमकिन नहीं था कि पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना सके या फिर बिना जोड़े-तोड़े कोई भी अपनी सरकार बना सके। पहले तो सब अलग-अलग ही चुनाव के मैदान में उतरे थे और जैसे ही कांग्रेस ने देखा कि बीजेपी सबसे ज्यादा सीटें और सबसे बड़े दल के साथ भी बहुमत नहीं पा सकती तो उसने तुरंत ही जेडीएस के साथ हाथ मिला लिया। जिसको प्रचार के समय उसने बहुत ही खरी-खोटी सुनाई थी। खुद राहुल गांधी ने JDS पार्टी को बीजेपी की B-पार्टी बताया था। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद खुद ही B-पार्टी बन गई। क्या यह एक आदर्श लोकतांत्रिक तरीका है? कि सबसे बड़े दल को हराने के लिए दूसरे नंबर वाला दल तीसरे नंबर के दल में जा मिले। अगर कांग्रेस-JDS को यही करना था तो दोनों को मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए था। ये तो सरासर कर्नाटक की जनता के साथ छल है। इन सभी सवालों पर संविधान मौन है, इस खंडित जनादेश की स्थिति में कोई सरकार कैसे बने? क्या राजनौतिक दलों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि ये तूतू-मैंमैं बंद करके खंडित जनादेश की हालत में सरकार गठन संबंधी नियम-कानून के आभाव को प्राथमिकता से दूर करे।

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जोड़-तोड़ व छल से बनती सरकारें

ये बात तो हमेशा से ही तय है कि जब तक ये जनादेश खंडित होता रहेगा तबतक सरकार के गठन की ये प्रकिया बिना नियमों के खेल में तबदील होती रहेगी और इसी तरह जोड़-तोड़ व छल से सरकारें बनती रहेंगी। क्योंकि अपने स्वार्थ के चलते राजनैतिक दलों ने कभी कोशिश ही नहीं की कि त्रिशंकू सदन में सरकार को बनाने के लिए उचित तौर-तरीके अपनाए जाएं। वे चुनाव गठबंधन के मामले में भी इसलिए उदासीन बने रहे ताकि उन्हें जनादेश की मनमानी व्याख्या करने का मौका मिल सके।

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जनता को दें जवाब

इसमें कोई दोराय नहीं है कि राज्यपाल वजूभाई वाला ने केवल भाजपा के मन के हिसाब से ये फैसला लिया था कि येदुरप्पा ही शपथ लेंगे। लेकिन उनके इस फैसले पर ये कहने का कोई मतलब नहीं है कि उन्होंने लोकतंत्र की हत्याकर दी है। आखिरकार वे लोग ऐसा कैसे कह सकते है जो अपने समय में राज्यपालों से अपने मन मुताबिक फैसले कराते रहें हैं और पसंदीदा दलों को सरकार के रूप में बनवाते आएं है? कर्नाटक के राज्यपाल ने तो वही किया जो कांग्रेस के समय के राज्यपाल किया करते थे। भले ही सुप्रीम कोर्ट कांग्रेस की य़ह शिकायत सुनने को तैयार हो गई हो कि सबसे बड़े दल को सरकार गठन के लिए क्यों बुलाया ? लेकिन ये भी सबको पता है कि यह वही कांग्रेस है जो गोवा औऱ मणिपुर के चुनावों के बाद ये कह रही थी कि सबसे बड़े गठन को क्यों नहीं बुलाया? ये अच्छा होगा कि पहले कांग्रेस ये साफ करे कि वो तब सही थी या अब? क्योंकि यह सवाल तो राज्यपाल के लिए कांग्रेस ने भी उठाया है कि उन्होंने तब सही फैसला किया था या अब।

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