रथयात्राः श्रीजगन्नाथमय हुआ ओडिशा

0
105

पुरी: श्रीजगन्नाथ रथयात्रा धार्मिक महोत्सव शनिवार को अपरान्ह शुरू होगा। सबेरे से ही उत्साहित भक्तगण जमा हो रहे हैं। बड़दंड खचाखच भर गया। देवी देवता का स्वरूप बने लोग महाप्रभु के स्वागत में रथ के आगे कलाओं का प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रख्यात नृत्य ओडिशी कलाकार भी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। पुराणों में जगन्नाथ धाम को बैकुंठ धाम भी कहा जाता है। जगन्नाथ धाम हिन्दू धर्म के पवित्र चार धाम बद्रीनाथ, द्वारिका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी में से एक है।

मौसम खुशगवार है। बताते हैं कि बड़े पैमाने पर यह 141वीं रथयात्रा होगी। अषाढ़ पक्ष की द्वितया को रथ यात्रा निकाली जाती है। देश दुनिया से करीब 5 से 8 लाख लोगों के एकत्र होने का दावा जिला प्रशासन ने किया है। महत्वपूर्ण दिन आज है। महाप्रभु जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और बलभरद्र भक्तों को दर्शन देने श्रीमंदिर से बाहर आएंगे और गुंडिचा स्थित मौसी मां के यहां जाएंगे। यह श्रीमंदिर से दो किलोमीटर दूरी पर है। 16 कलाओं से परिपूर्ण श्रीजगन्नाथ विष्णु के अवतार माने जाते हैं। शुक्रवार को लाखों भक्तों ने श्रीविग्रहों के नवयौवन वेश का दर्शन किया था। त्रिस्तरीय सुरक्षा के बीच रथ यात्रा की तैयारियां जारी हैं। सुबह से ही भारी संख्या में भक्तों की भीड़ ने पुरी की पावन धरती में पहुंच कर अपने प्रभु के समक्ष अश्रुपूर्ण नेत्र भक्तिभाव प्रदर्शित करेंगे। यह भाव पूर्ण दृश्य का ओडिशा गवाह होगा। शनिवार सुबह से ही स्थानीय चैनलों में लाइव टेलीकास्ट देखने के लोग घरो में टीवी के सामने सपिरवार बैठ गए। जय जगन्नाथ नयन पथ गामी भव तुमे…का नारा गुंजायमान हो रहा है। राज्यपाल समेत तमाम वीआईपी पुरी पहुंच चुके हैं।

भक्तों की आस्था का सैलाब पुरी में उमड़ चुका है। सुरक्षा व्यवस्था के तहत 145 प्लाटून पुलिस बल तैनात किया गया है। एडीजी सत्यजित महंति को सुरक्षा कमान सौंपी गयी है। एक हजार से ज्यादा पुलिस अधिकारी व हजारों होमगार्ड भी तैनात हैं।

रथयात्रा के दौरान कई पारंपरिक वाद्यंत्रों की सुरीली ध्वनि के बीच तीन बड़े-बड़े रथों को भक्तगण मोटे-मोटे रस्सों की मदद से खींचते हैं। पहले बलभद्र जी का रथ प्रस्थान करता, इसके बाद बहन सुभद्रा जी का रथ चलना शुरू होता है और सबसे आखिर में जगन्नाथ जी की रथ यात्रा निकलती है। गंतव्य गुंडिचा मंदिर होता है जहां पर महाप्रभु मौसी के निवास पर ठहरते हैं। यह वही मंदिर’ है, जहां विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। यह कहा जाता है कि पुरी में भगवान जगन्नाथ शहर में घूमने के लिए निकलते हैं। यह उत्सव नौ दिनों तक चलता है। कहा जाता है कि 9 दिन पूरे होने के बाद भगवान जगन्नाथ, जगन्नाथ मंदिर में विराजते हैं।

विग्रह रथ मे स्थापित, रथयात्रा का थीम है धरोहर

महाप्रभु का रथ खींचने का काम करीब चार बजे से होगा। भजन संगीत, जय जगन्नाथ के गगनभेदी उद्घोष के साथ ही विग्रहों को रथ में स्थापित करने का काम शुरू हो गया है। पहले सुदर्शन चक्र, बलभद्र और देवी सुभद्रा व फिर महाप्रभु जगन्नाथ का विग्रह लाकर रथ पर स्थापित किया गया। विश्व विख्यात रथयात्रा का इस साल का थीम है धरोहर। राज्यपाल प्रो.गणेशी लाल और मुख्यमंत्री नवीन पटनायक पुरी पहुंच चुके हैं।

श्रीजगन्नाथ, देवी सुभद्रा व बलभद्र के रथ पर विराजमान होने के बाद रथ के सामने श्रीमंदिर के प्रधान सेवायत गजपति महाराज दिव्यसिंह देव सोने के हत्थे वाला झाड़ू लेकर पालकी से आकर रथ के सामने का क्षेत्र की प्रतीकात्मक सफाई करेंगे। इसके बाद परंपरागत तरीके से भक्ति संगीत के बीच रथयात्रा शुरू हो जाएगी। सबसे पहले बलभद्र फिर सुभद्रा का रथ भक्तगण खींचते हैं।

लोगों का कहना है कि रथ खींचने वाले भक्तजनों के सभी दुख दूर हो जाते हैं और उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है। नगर भ्रमण करते हुए शाम को ये तीनों रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं। अगले दिन भगवान रथ से उतर कर मंदिर में प्रवेश करते हैं और वहीं रहते हैं। यह उनकी मौसी का घर होता जहां पर सात दिन तक उन्हें खुश रखने के लिए प्यार दुलार भक्तिसंगीत पकवानों का भोग लगाया जाता है। यह महाप्रसाद माना जाता है। श्रीमंदिर समिति से जानकारी मिली है कि रथयात्रा का शुभ मुहूर्त अषाढ़ शुक्ल की द्वितीया तिथि 14 जुलाई की सुबह 4 बजकर 32 मिनट से शुरू होकर 15 जुलाई 12.55 बजे तक रहेगी।

बताते हैं कि रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है, जिनमें विष्णु, कृष्ण, वामन और बुद्ध भी शामिल हैं। पुरी के अलावा भी भारत के अलावा विश्व के कुछ देशों में भी रथयात्रा निकाली जाती है।.

रथ की विशेष बातें

मंदिर से बाहर आकर दर्शन देते हैं महाप्रभु जगन्नाथ। उनका नंदीघोष रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलरामजी का तालध्वज रथ 45 फीट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है।

मंदिर क्यों है खास

  1. जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर स्थित झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है।
  2. इसी तरह मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र भी है। इस चक्र को किसी भी दिशा से खड़े होकर देखने पर ऐसा लगता है कि चक्र का मुंह आपकी तरफ है।
  3. मंदिर की रसोई में प्रसाद पकाने के लिए 7 बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं। यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है। इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है।
  4. मंदिर के सिंहद्वार से पहला कदम अंदर रखने पर ही आप समुद्र की लहरों से आने वाली आवाज को नहीं सुन सकते। आश्चर्य में डाल देने वाली बात यह है कि जैसे ही आप मंदिर से एक कदम बाहर रखेंगे, वैसे ही समुद्र की आवाज सुनाई देने लगती है। यह अनुभव शाम के समय और भी अलौकिक लगता है।
  5. आपने ज्यादातर मंदिरों के शिखर पर पक्षी बैठे और उड़ते देखे हैं। जगन्नाथ मंदिर की यह बात आपको चौंका देगी कि इसके ऊपर से कोई पक्षी नहीं गुजरता। यहां तक कि हवाई जहाज भी मंदिर के ऊपर से नहीं निकलता।
    मंदिर में हर दिन बनने वाला प्रसाद भक्तों के लिए कभी कम नहीं पड़ता साथ ही मंदिर के पट बंद होते ही प्रसाद भी खत्म हो जाता है।
  6. दिन के किसी भी समय जगन्नाथ मंदिर के मुख्य शिखर की परछाई नहीं बनती।
  7. एक पुजारी मंदिर के 45 मंजिला शिखर पर स्थित झंडे को रोज बदलता है। ऐसी मान्यता है कि अगर एक दिन भी झंडा नहीं बदला गया तो मंदिर 18 वर्षों के लिए बंद हो जाएगा।
  8. आमतौर पर दिन में चलने वाली हवा समुद्र से धरती की तरफ चलती और शाम को धरती से समुद्र की तरफ. चकित कर देने वाली बात यह है कि पुरी में यह प्रक्रिया उल्टी है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here