प्रियंका के लिए वाराणसी यात्रा चुनौतियों भरा दौर

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वाराणसी: गंगा यात्रा पर निकलीं प्रियंका गांधी आज वाराणसी पहुंच रही हैं. कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह भर वह पार्टी में नई जान फूंकना चाहती हैं लेकिन उनके सामने कई कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी बुधवार को अपनी गंगा यात्रा के आखिरी पड़ाव पर वाराणसी पहुंचने वाली हैं. 5 लोकसभा सीटों वाले इलाके में गंगा के किनारे बसे लोगों से मिलकर वह बड़ा संदेश देना चाहती हैं. वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्षेत्र है, ऐसे में कार्यकर्ताओं को यह बताना जरूरी है कि पार्टी किसी सीट को हल्के में नहीं रही है. प्रियंका गांधी इन 3 दिनों में हजारों लोगों से मिली हैं.

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वाराणसी में कांग्रेस की राह इतनी आसान नहीं है. हालात ऐसे हैं कि यहां कांग्रेस के नेता तो हैं लेकिन कैडर मजबूत नहीं है. कैडर को मजबूत करने के साथ ही प्रियंका गांधी को कई और चुनौतियों से जूझना होगा.
कांग्रेस सबसे पुरानी पार्टी है और एक समय था कि वाराणसी से कांग्रेस के सांसद चुने जाते थे, लेकिन 1989 में जनता दल ने एक बार जो कांग्रेस को बेदखल किया उसके बाद पार्टी केवल 2004 में सफल हो पाई जब कांग्रेस से राजेश मिश्रा सांसद चुने गए. अगर प्रियंका गांधी की गंगा यात्रा को देखें तो इसमें भी कार्यकर्ताओं का अभाव सा दिखता है.

मंगलवार को जब प्रियंका गांधी मां विंध्यवासिनी के मंदिर पहुंचीं तो वहां हर-हर मोदी के नारे लगाने वाले पहुंच गए. अगर कार्यकर्ताओं की मजबूत टीम होती तो ऐसा होना मुश्किल था. 2009 के चुनाव में भी सोनिया और प्रियंका की रैली में बहुत भीड़ देखी गई, लेकिन वह भीड़ वोटों में तब्दील नहीं हो पाई और कांग्रेस के उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा.
अगर लोकसभा की बात करें तो मंदिर आंदोलन के बाद केवल एक बार 2004 में कांग्रेस प्रत्याशी राजेश मिश्रा को यहां से विजय मिली. इससे पहले 1991,1996,1998, 1999 में बीजेपी के प्रत्याशी यहां से जीतते रहे. बीजेपी के शंकर प्रसाद जायसवाल यहां से 3 बार सांसद रहे. 2009 में यहां से बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी सांसद चुने गए. 2014 के चुनाव में तो नरेंद्र मोदी ने सारे समीकरण बदल दिए और प्रचंड वोटों से यहां से सांसद चुने गए. कांग्रेस के अजय राय तीसरे स्थान पर रहे. 2009 के मुकाबले कांग्रेस को कम वोट मिले. आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यहां से दूसरे स्थान पर रहे. उन्हें 2 लाख से ज्यादा वोट मिले थे जबकि कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय को करीब 75000.

अगर विधानसभा की बात करें तो वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में 5 विधानसभा आती हैं, रोहनियां, वाराणसी नॉर्थ, वाराणसी साउथ वाराणसी कैंट और सेवापुरी. लेकिन किसी भी सीट पर फिलहाल कांग्रेस का विधायक नहीं है. 2017 के चुनाव में रोहनिया से बीजेपी को जीत मिली जबकि 2014 के विधानसभा उप चुनाव में कांग्रेस को केवल 3207 वोट मिले थे. इसी तरह वाराणसी नॉर्थ में कांग्रेस हाशिए पर रही. वाराणसी साउथ में कांग्रेस फाइट में रही जहां कांग्रेस के प्रत्याशी राजेश मिश्रा बीजेपी के बाद दूसरे नंबर पर रहे. वाराणसी कैंट में भी कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही लेकिन जीत का करीब 60000 रहा. सेवापुरी से अपना दल (सोनेलाल) का विधायक जीता. कांग्रेस का यहां हाशिए पर रही.

ऐसे में वाराणसी में कार्यकर्ताओं को मजबूत करना सबसे बड़ी चुनौती है. अगर पार्टी वाकई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ यहां से लड़ना चाहती है तो उसे पहले ही प्रत्याशी के नाम की घोषणा करनी होगी जिससे कार्यकर्ताओं में कोई भ्रम न रहे. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसी दौरे में प्रियंका को यह भी घोषणा करनी होगी कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ कांग्रेस का उम्मीदवार उतरेगा या एसपी-बीएसपी के उम्मीदवार को समर्थन दिया जाएगा. ग्रास रूट पर काम करके ही संगठन तैयार होगा जो कांग्रेस को जगह दिलाने में कामयाब हो सकता है.

कांग्रेस ने इससे पहले भी वाराणसी में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश की. मोदी सरकार के दो साल पूरे होने पर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह वहां पहुंचे थे जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार की नाकामियां गिनाई थीं. वाराणसी में आयोजित किसान सम्मेलन में राहुल गांधी भी जा चुके हैं. लेकिन जिस वाराणसी को आरएसएस का गढ़ माना जाता हो, जहां से बीजेपी लगातार जीत हासिल कर रहे हों, वहां पर पार्टी को मजबूत करने के लिए कैडर को और मजबूत करना होगा.