विजय दिवस: जब 93 हजार पाक सैनिको ने भारत के सामने टेके दिये थे घुटने

निर्मला और राहुल ने दी 1971 के शहिदो को श्रद्धांजलि

Published On: Dec 16, 2017 02:17 PM IST | Updated On: Dec 16, 2017 02:17 PM IST |   78

नई दिल्ली।

भारत और बांग्लादेश के इतिहास में 16 दिसंबर का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन बांग्लादेश स्वतंत्र घोषित हुआ था। इसमें भारतीय जवानों ने अदम्य साहस और वीरता का परिचय देते हुए पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था। भारत और बांग्लादेश इस ऐतिहासिक दिन को ‘विजय दिवस’ के तौर पर मनाते हैं। इसी दिन पूर्वी पाकिस्तान हमेशा के लिए नक्शे से मिट गया और बांग्लादेश के तौर पर एक नए स्वतंत्र राष्ट्र का उदय हुआ था। बांग्लदेश को आजाद कराने में भारतीय सेना की भूमिका से सभी अवगत हैं। इतिहास उनकी शौर्य गाथाओं से भरा है।

निर्मला और राहुल ने दी 1971 के शहिदो को श्रद्धांजलि

शहीदों को श्रद्धांजलि

1971 की लड़ाई में शहीद होने वाले सैनिकों को विजय दिवस के मौके पर श्रद्धांजलि दी गई. इस अवसर पर अमर जवान ज्योति पर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण, आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत, नौसेना प्रमुख सुनील लांबा और एयर चीफ मार्शल बीरेंद्र सिंह धनोहा मौजूद थे. वहीं राहुल गांधी ने ट्वीट कर शहीदों को याद किया. उन्होंने ट्वीट कर लिखा, 'विजय दिवस पर, हम भारतीय सेना के बहादुर जवानों को सलाम करते हैं. हम 1971 के युद्ध के शहीदों के साहस और त्याग को सलाम करते हैं. हम सभी अपने सैनिकों की वीरता याद रखें, जो हर दिन भारत की स्वतंत्रता की रक्षा करते हैं.'

ऐसे हुआ युद्ध शुरू

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3 दिसंबर, 1971 की मध्यरात्रि को देश के नाम संदेश में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सूचना दी कि शाम 5.30 पर पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत के अमृतसर, पठानकोट, श्रीनगर, अवन्तिपुर, उत्तरलाई, जोधपुर, अंबाला और आगरा के सैन्य ठिकानों पर बमवर्षा की है. इसके साथ ही भारत को युद्ध में कूदना पड़ रहा है.

इस संदेश में उन्होंने ये भी कहा था कि ये लड़ाई केवल अपने बचाव के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए है. याद रहे कि भारत सरकार बांग्लादेश, जो कि तब तक पाकिस्तान का हिस्सा हुआ करता था, में पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे कत्लेआम के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बना रहा था. इस ही का नतीजा ये युद्ध भी था.

पाकिस्तान के लोगों में थी जबर्दस्त नाराजगी

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पाकिस्तान के गठन के समय पश्चिमी क्षेत्र में सिंधी, पठान, बलोच और मुजाहिरों की बड़ी संख्या थी,जबकि पूर्व हिस्से में बंगाली बोलने वालों का बहुमत था। पूर्वी पाकिस्तान में राजनैतिक चेतना की कभी कमी नही रही लेकिन पूर्वी हिस्सा देश की सत्ता मे कभी भी उचित प्रतिनिधित्व नही पा सका एवं हमेशा राजनीतिक रूप से उपेक्षित रहा। इससे पूर्वी पाकिस्तान के लोगों में जबर्दस्त नाराजगी थी। इसी नाराजगी का राजनैतिक लाभ लेने के लिए बांग्लादेश के नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने अवामी लीग का गठन किया और पाकिस्तान के अंदर ही और स्वायत्तता की मांग की। 1970 में हुए आम चुनाव में पूर्वी क्षेत्र में शेख की पार्टी ने जबर्दस्त विजय हासिल की। उनके दल ने संसद में बहुमत भी हासिल किया लेकिन प्रधानमंत्री बनाने की जगह उन्हें जेल में डाल दिया गया यहीं से पाकिस्तान के विभाजन की नींव रखी गई।

ऑपरेशन सर्चलाइट, ऑपरेशन चंगेज खान और लड़ाई

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बांग्लादेश बनने से पहले पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने स्थानीय नेताओं और धार्मिक चरमपंथियों की मदद से मानवाधिकारों का हनन किया। 25 मार्च 1971 को शुरू हुए ऑपरेशन सर्च लाइट से लेकर पूरे बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के दौरान पूर्वी पाकिस्तान में जमकर हिंसा हुई। बांग्लादेश सरकार के मुताबिक इस दौरान करीब 30 लाख लोग मारे गए। पाकिस्तान सरकार की ओर से गठित किए गए हमूदूर रहमान आयोग ने इस दौरान सिर्फ 26 हजार आम लोगों की मौत का नतीजा निकाला।

1971 के दिसंबर महीने में ऑपरेशन चंगेज खान के जरिए भारत के 11 एयरबेसों पर हमला कर दिया जिसके बाद 3 दिसंबर 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की शुरुआत हुई। महज 13 दिन के बाद पाकिस्तान की 93 हजार फौज ने सरेंडर कर दिया। पाकिस्तान आर्मी के चीफ नियाजी ने अपने बिल्ले को उतारा और प्रतीक स्वरूप अपनी रिवॉल्वर लेफ्टीनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को सौंप दी।

इस लड़ाई की खास बात ये थी कि अमेरिका ने भारत के खिलाफ अपने सातवें बेड़े को उतार दिया। चीन और पाकिस्तान की शह पर पाकिस्तान पीछे हटने को तैयार नहीं था।भारत की मदद के लिए रूस आगे आया। सातवें बेड़े के पहुंचने के पहले भारत की सेनाओं ने ढाका की तीन तरफ से घेरेबंदी की और इसके साथ ही ढाका में गवर्नर हाउस पर हमला कर दिया। जिस समय भारत ने हमला किया उस वक्त गवर्रनर हाउस में पाकिस्तान के बड़े अधिकारियों की मीटिंग चल रही थी। भारतीय हमले की वजह से नियाजी घबरा गए। उन्होंने भारत को युद्ध विराम का संदेशा भिजवाया। लेकिन जनरल मानेकशॉ से साफ कर दिया कि युद्ध विराम नहीं बल्कि पाकिस्तान को सरेंडर करना होगा।

1971 में तत्कालीन पूर्व पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में नरसंहारों के बाद कई सामूहिक कब्र बनाई गईं, जिनका पता अब तक चलता रहा है। 1999 में ढाका में मस्जिद के पास एक विशाल कब्र का पता चला। बंगालियों के खिलाफ किए गए अत्याचार का पता ढाका में मौजूद अमेरिकी वाणिज्यिक दूतावास से भेजे गए टेलीग्राम से लगता है। इस टेलीग्राम के मुताबिक बंगालियों के खिलाफ युद्ध की पहली ही रात को ढाका यूनिवर्सिटी में छात्रों और आम लोगों को सरेआम मौत के घाट उतार दिया गया। उन सभी इलाकों मे नरसंहार किये गये जहां से विरोध की आशंका थी। यहां तक कि लोगों को घरों से बाहर निकाल कर के गोलियों से भून दिया गया।

पाकिस्तान ने 3 दिसंबर को भारत के 11 एयरफील्ड पर बोल दिया था हमला

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लेफ्टिनेंट जनरल पीएस मेहता कहते हैं, भारतीय सशस्त्र बल हर साल 16 दिसंबर को वर्ष 1971 में पाकिस्तान पर फतह की याद में विजय दिवस के तौर पर मनाते हैं। पाकिस्तान ने 3 दिसंबर को भारत के 11 एयरफील्ड पर हमला बोल दिया था। सही मायनों में इसके बाद ही युद्ध की शुरुआत हुई थी। इसके जवाब में भारत ने पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान पर हमला बोल दिया था। भारतीय वायुसेना, सेना और नौसेना के जवानों ने महज 13 दिनों में ही ढाका को आजाद करा दिया था। इस दिन के बाद नए देश का जन्म हुआ जो बांग्लादेश के नाम से जाना गया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस तरह से शायद पहली बार नए देश का उदय हुआ था। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी जनरल एए खान नियाजी को 90 हजार जवानों के साथ समर्पण करने के लिए बाध्य कर दिया था। सैन्य इतिहास में इस घटना को ऐतिहासिक माना जाता है।’ उन्होंने बताया कि इस साल का विजय दिवस खास रहने वाला है, क्योंकि कोलकाता के फोर्ट वीलियम में आयोजित समारोह में बांग्लादेश सेना के मौजूदा और पूर्व जवान शामिल होंगे।

ज्यादती ऐसी की रूह कांप जाए

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1971 में पूर्वी पाकिस्तान में लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार, अत्याचार किया गया और हत्या की गईं। एक अनुमान के मुताबिक ऐसी करीब चार लाख महिलाओं के साथ ऐसी ज्यादतियां की गईं जिनमे उनके साथ बलात् यौन संबंधों को बनाना, सैन्य छावनी में सामूहिक बलात्कार जैसी हरकतें थीं। पाक सेना के अत्याचारों से परेशान होकर के लगभग 10 लाख लोग भारत चले गए एक दूसरे अनुमान के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान में अत्याचार से तंग आकर करीब 80 लाख लोग भारत की सीमा में प्रवेश कर गए थे।भारत के इस लड़ाई में दखल देने के पीछे इन शरणार्थियों के भारत में प्रवेश एवं इस वजस से भारत के ऊपर पड़ने वाले आरथिक दबाव को भी एक वजह माना जाता है।

बांग्लादेश की आज़ादी के लिए किया संघर्ष

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बांग्लादेश के संस्थापक नेता शेख मुजीब-उर-रहमान ने बांग्लादेश की आज़ादी के लिए संघर्ष किया। बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीब को 'बंगबंधु' की उपाधि से नवाजा गया। अवामी लीग के नेता शेख मुजीब बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बने। हालांकि 1975 में उनके सरकारी आवास पर ही सेना के कुछ जूनियर अफसरों और अवामी लीग के कुछ नेताओं ने मिलकर शेख मुजीब-उर-रहमान की हत्या कर दी। उस वक्त उनकी दोनों बेटियां शेख हसीना वाजेद और शेख रेहाना तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी की यात्रा पर थीं।

 

 

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