गूगल ने डूडल बनाकर ऑक्सफोर्ड से लॉ करने वाली पहली भारतीय महिला को दी श्रद्धांजलि

अपने 20 साल के करियर में उन्होनें 600 महिलाओं और बच्चों के लिए काम किया। इसके लिए उन्होनें किसी से भी अपनी सर्विस के लिए फीस नहीं ली।

Namrata Singh | Published On: Nov 15, 2017 12:02 PM IST | Updated On: Nov 15, 2017 12:07 PM IST |   131

खास बातें-

  • 15 नवंबर को Cornelia Sorabji की 151वीं जयंती पर शानदार डूडल बनाया है
  • गूगल ने अपने इस डूडल के माध्यम से Cornelia Sorabji को श्रद्धांजलि अर्पित की है

नई दिल्ली।

गूगल हर किसी खास मौके पर अपना डूडल बनाता है और आज यानि 15 नवंबर को Cornelia Sorabji की 151वीं जयंती पर शानदार डूडल बनाया है। गूगल ने अपने इस डूडल के माध्यम से Cornelia Sorabji को श्रद्धांजलि अर्पित की है। Cornelia एक प्रेरणादायक महिला थीं, जिनके नाम पर कई काम पहले करने का रिकॉर्ड है। भारत और ब्रिटेन में वकालत की प्रेक्टिस करने वाली पहली महिला थीं। इसके अलावा मुंबई विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट होने वाली पहली महिला भी Cornelia ही थीं। इसके बाद उन्होंने ब्रिटिश विश्वविद्यालय में अध्ययन करने वाला पहला छात्र बनने का रिकॉर्ड भी अपने नाम किया था।

गूगल का डूडल आज कॉर्नेलिया सोराबजी का 151वां जन्मदिन मना रहा है। कॉर्नेलिया पहली भारतीय महिला थी जिन्होनें बॉम्बे विश्विविद्यालय से स्नातक किया और वो ब्रिटेन विश्वविद्यालय से वकालत पढ़ने वाली पहली भारतीय थी। इसी के साथ कॉर्नेलिया कई सामाजिक सुधार आंदोलनों से जुड़ी रहीं। कोरनेलिया ने महिलाओं और शोषित वर्ग के अधिकारों की लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कॉर्नेलिया के पिता ने ही उन्हें घर पर शिक्षा दी थी। उनके पिता कई मिशनरी स्कूलों में पढ़ाते थे। ऐसा माना जाता है कि नारीवाद उनके खून में था, उनकी माता ने पुणे में लड़कियों की शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए कई स्कूल खोले थे। उसी तरह कॉर्नेलिया की माता ने उनके विचारों को बनाया था। कॉर्नेलिया के पांच भाई और एक बहन थी।

 बॉम्बे में टॉप करने के बाद इंग्लैंड में कॉर्नेलिया ने नेशनल इंडियन एसोसिएशन में अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए एक याचिका दायर की थी। इसके बाद कई नामी लोगों ने उनकी शिक्षा के लिए फंड दिए। 1892 में उन्होनें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से वकालत पूरी की। उनकी शिक्षा के दौरान कई बार शिक्षक उनके पेपर देखने से मना कर देते थे और बुरे नंबर से उन्हें पास करा जाता था। साथी उन्हें पसंद नहीं करते थे क्योंकि वो एक महिला को अपने साथ वकालत करते हुए बर्दाश नहीं कर पा रहे थे। 1894 में भारत लौटने के बाद उन्होनें महिला अधिकारों के लिए काम करना शुरु कर दिया था। वकालत के दौरान उन्हें कोर्ट में केस लड़ने नहीं दिया जाता था क्योंकि अंग्रेजराज के दौरान महिलाओं को वकील बनने का अधिकार प्राप्त नहीं था।
कॉर्नेलिया ने इंडियन ऑफिस में महिलाओं को कानूनी सलाहकार के तौर पर रखे जाने के लिए याचिका दायर करी और इसके बाद 1904 में बंगाल के वॉर्डस कोर्ट में लेडी असिस्टेंट के तौर पर उन्हें रखा गया। उन्होनें बंगाल, बिहार, ओड़िसा और असम के लिए काम करना शुरु कर दिया। अपने 20 साल के करियर में उन्होनें 600 महिलाओं और बच्चों के लिए काम किया। इसके लिए उन्होनें किसी से भी अपनी सर्विस के लिए फीस नहीं ली। 1924 में उन्हें काम के लिए पहली बार फीस मिली और उसके बाद महिलाओं के लिए वकालत एक प्रोफेशन की तरह सबके सामने आया। कॉर्नेलिया ने कलकत्ता से अपनी वकालत की शुरु की थी। वकालत से हटकर उन्होनें कई किताबें लिखी थी। इसी में उनकी आत्मकथा- बिटवीन द ट्विलाइट्स भी शामिल है।

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