ओडिशा जारी रखेगा रसगुल्ला पर जंग

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Mahesh Sharma | Published On: Nov 15, 2017 11:44 AM IST |   11

 

भुवनेश्वर। रसगुल्लापर दावा की जंग ममता बनर्जी ने जीत ली है। इसका जिओग्राफिकल इंडीकेशन (जीआई) टैग पश्चिम बंगाल के नाम हो गया है। यानी रसगुल्ला ओडिशा का न होकर पश्चिम बंगाल का हो गया। जीआई रजिस्ट्री के सहायक रजिस्ट्रार चिन्नाराजा जी. नायडू ने इसकी पुष्टि की। उधर ओडिशा सरकार के प्रवक्ता सूर्यनारायण पात्रा का कहना है कि जंग अभी हारी नहीं है। दावा फिर पेश किया जाएगा। उधर भाजपा प्रवक्ता सज्जन शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार की ढिलायी के कारण रसगुल्ला का जीआई टैग पश्चिम बंगाल को मिला। ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार ने दावे को झुठलाते हुए कहा कि ऐतिहासिक दस्तावेज प्रमाण हैं कि रसगुल्ला सबसे पहले ओडिशा में बनाया गया था। इसे जगन्नाथ संस्कृति से जोड़ा गया। पर ओडिशा सरकार वांछित दस्तावेज रजिस्ट्रार के समक्ष रखने में नाकाम रही।

जीआई रजिस्ट्रार कार्यालय चेन्नई के सीनियर परीक्षक प्रशांत कुमार का कहना है कि ओडिशा के पास प्रामाणिक दस्तावेज दाखिल करने का अभी भी वक्त है। यदि ओडिशा में इसमें कामयाब होता है तो फैसला बदला भी जा सकता है। पश्चिम बंगाल का रसगुल्ला अलग से ही दिखता है। ओडिशा में जगन्नाथ संस्कृति पर शोध करने वाले असित महंति का कहना है कि रसगु्ल्ला 1893 के पहले से महाप्रभु के भोग में प्रयोग किया जाता रहा है। जबकि पश्चिम बंगाल में इसके होने का प्रमाण 1896 से पहले का नहीं मिलता। महंति का कहना है कि उन्होंने ओडिशा सरकार के विज्ञान एंव तकनीकी मंत्री प्रदीप पाणिग्रही को समस्त दस्तावेज सौंप दिए थे। अब उन्होंने जीआई रजिस्ट्रार कार्यालय में ये कागजात दाखिल कराए या नहीं वे जानें। पर इतना पक्का है कि रसगुल्ला प.बंगाल का नहीं है यह तो ओडिशा का है।  

ओडिशा में रसगुल्ला बनाने वालों ने सरकार के रवैये पर विरोध करते हुए कहा कि सरकार की ढिलायी के कारण रसगुल्ला पर ओडिशा का दावा हल्का पड़ गया। सही समय पर दस्तावेज सौंपे जाते तो निश्चित जीआई टैग ओडिशा का होता। प.बंगाल मुख्यमंत्री कार्यालय से इसकी पुष्टि की गयी। यह विवाद 2015 से चल रहा है। ममता सरकार के फूड एवं प्रोसेसिंग विभाग के मुताबिक रसगुल्ला का अविष्कार सबसे पहले प.बंगाल में 1868 में नवीन चंद्र दास ने किया था। ओडिशा सरकार ने दावा किया है कि इसका उल्लेख 15-16वीं शताब्दी में दांडी रामायण में भी किया गया है। रसगुल्ला पहले रसगोला के नाम से महाप्रभु के भोग में चढ़ाया जाता रहा है। यह दावा जगन्नाथ संस्कृति के शोधकर्ता असित महंति करते हैं।

 

 

 

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