बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है दशहरा

सम्पूर्ण भारतवर्ष में हर्ष और उल्लास के साथ इस त्योहार को मनाया जाता है

Himanshu Srivastava | Published On: Sep 30, 2017 11:40 AM IST |   1054

आश्विन शुक्ल दशमी के दिन विजयदशमी (दशहरा) का त्योहार मनाया जाता है। दशहरा हिन्दू त्योहारों में महत्वपूर्ण त्योहार है। सम्पूर्ण भारतवर्ष में हर्ष और उल्लास के साथ इस त्योहार को मनाया जाता है। इस दिन को असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक के रूप में मान्यता है। इस दिन भगवान राम ने रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से छुड़ाया था।  रावण वध से पूर्व राम ने दुर्गा की आराधना की थी व मां दुर्गा ने उनकी पूजा से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का वरदान दिया था।

दशहरा अथवा विजयादशमी रामचंद्र की विजय के रूप में मनाया जाए या दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा का पर्व माना जाता है। नवरात्र में पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा विश्व प्रसिद्ध है तो नवरात्र में गुजरात का डांडिया भी बेजोड़ है। डांडिया विदेशों में बसे भारतीयों के बीच भी अति लोकप्रिय है।

दशहरा – उत्सव का दसवां दिन

नवरात्रि, बुराई और ऊधमी प्रकृति पर विजय पाने के प्रतीकों से भरपूर है। इस त्यौहार के दिन, जीवन के सभी पहलुओं के प्रति, जीवन में इस्तेमाल की जाने वाली वस्तूओं के प्रति अहोभाव प्रकट किया जाता है। नवरात्रि के नौ दिन, तमस रजस और सत्व के गुणों से जुड़े हैं। पहले तीन दिन तमस के होते हैं, जहां देवी रौद्र रूप में होती हैं – जैसे दुर्गा या काली। उसके बाद के तीन दिन लक्ष्मी को समर्पित हैं – ये देवी सौम्य हैं, पर भौतिक जगत से सम्बंधित हैं। आखिरी तीन दिन सरस्वती देवी यानि सत्व से जुड़े हैं, ये ज्ञान और बोध से सम्बंधित हैं।

दशहरा –  जीत का दिन

इन तीनों में अपना जीवन समर्पित करने से आपके जीवन को एक नया रूप मिलता है। अगर आप तमस में अपना जीवन लगाते हैं तो आपके जीवन को एक तरह की शक्ति आएगी। अगर आप रजस में अपना जीवन लगाएंगे, तो आप किसी अन्य तरीके से शक्तिशाली होंगे। और अगर आप सत्व में अपना जीवन लगाएंगे, तो एक बिलकुल अलग तरीके से शक्तिशाली बन जाएंगे। लेकिन अगर आप इन सबसे परे चले जाएं तो फिर ये शक्तिशाली बनने की बात नहीं होगी, फिर आप मुक्ति की ओर चले जाएंगे। नवरात्रि के बाद दसवां और अंतिम दिन विजयादशमी या दशहरा का होता है –  इसका मतलब है कि आपने इन तीनों पर विजय पा ली है। आपने इन में से किसी के भी आगे घुटने नहीं टेके, आपने हर गुण के आर-पार देखा। आपने हर गुण में भागीदारी निभाई, पर आपने अपना जीवन किसी गुण को समर्पित नहीं किया। आपने सभी गुणों को जीत लिया। ये ही विजयदशमी है – विजय का दिन। इसका संदेश यह है – कि जीवन की हर महत्वपूर्ण वस्तु के प्रति अहोभाव और कृतज्ञता का भाव रखने से कामयाबी और विजय प्राप्त होती है।

दशहरा – भक्ति और अहोभाव

हम अपने जीवन को सफल बनाने के लिए बहुत से उपकरणों को काम में लाते हैं। जिन उपकरणों से हम अपना जीवन रचते हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण हमारा अपना शरीर और मन है। जिस धरती पर हम चल्रते हैं, जिस हवा में सांस लेते हैं, जो पानी हम पीते हैं और जो खाना खाते हैं – इन सभी वस्तूओं के प्रति अहोभाव रखने से हमारे जीवन में एक नई संभावना पैदा हो सकती है। इन सभी पहलुओं के प्रति अहोभाव और भक्ति रखने से हमें अपने सभी प्रयत्नों में सफलता मिलेगी।

दशहरा प्रेम और उल्लास के साथ मनाएं

इस तरह से नवरात्रि के नौ दिनों के प्रति या जीवन के हर पहलू के प्रति एक उत्सव और उमंग का नजरिया रखना और उसे उत्सव की तरह मनाना सबसे महत्वपूर्ण है। अगर आप जीवन में हर चीज को एक उत्सव के रूप में लेंगे तो आप बिना गंभीर हुए जीवन में पूरी तरह शामिल होना सीख जाएंगे। दरअसल ज्यादातर लोगों के साथ दिक्क्त यह है कि जिस चीज को वो बहुत महत्वपूर्ण समझते हैं उसे लेकर हद से ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। अगर उन्हें लगे कि वह चीज महत्वपूर्ण नहीं है तो फिर उसके प्रति बिल्कुल लापरवाह हो जाएंगे- उसमें जरूरी भागीदारी भी नहीं दिखाएंगे। जीवन का रहस्य यही है कि हर चीज को बिना गंभीरता के देखा जाए, लेकिन उसमें पूरी तरह से भाग लिया जाए- बिल्कुल एक खेल की तरह।

दशहरा हमेशा उल्लास से भरपूर त्यौहार रहा

भारतीय परंपरा में दशहरा हमेशा उल्लास से भरपूर त्यौहार रहा है, जहां समाज के सभी लोग एक साथ मिलकर नाचते और घुल मिल जाते हैं। लेकिन पिछले दो सौ सालों के बाहरी आक्रमणों और बाहरी प्रभावों की वजह से, ये परंपरा अब खो गयी है। वरना दशहरा हमेशा से ही उल्लास से भरा रहा है। बहुत सी जगहों में ये अब भी उल्लास से भरपूर है, पर अन्य जगहों पर यह परंपरा खो रही है। हमें इसे फिर से स्थापित करना होगा। विजयदशमी या दशहरा इस देश में सभी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है – चाहे वो किसी भी जाति, वर्ग या धर्म का हो – और इसे उल्लास  और प्रेम के साथ मनाया जाना चाहिए। ये मेरी इच्छा और आशीर्वाद है कि आप दशहरा पूरी भागीदारी, आनंद और प्रेम के साथ मनाएं।

दशहरा उत्सव की उत्पत्ति

दशहरा उत्सव की उत्पत्ति के विषय में कई कल्पनायें की गयी हैं। भारत के कतिपय भागों में नये अन्नों की हवि देने, द्वार पर धान की हरी एवं अनपकी बालियों को टाँगने तथा गेहूँ आदि को कानों, मस्तक या पगड़ी पर रखने के कृत्य होते हैं। अत: कुछ लोगों का मत है कि यह कृषि का उत्सव है। कुछ लोगों के मत से यह रणयात्रा का द्योतक है, क्योंकि दशहरा के समय वर्षा समाप्त हो जाती है, नदियों की बाढ़ थम जाती है, धान आदि कोष्ठागार में रखे जाने वाले हो जाते हैं। सम्भवत: यह उत्सव इसी दूसरे मत से सम्बंधित है। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भी राजाओं के युद्ध प्रयाण के लिए यही ऋतु निश्चित थी। शमी पूजा भी प्राचीन है। वैदिक यज्ञों के लिए शमी वृक्ष में उगे अश्वत्थ (पीपल) की दो टहनियों (अरणियों) से अग्नि उत्पन्न की जाती थी। अग्नि शक्ति एवं साहस की द्योतक है, शमी की लकड़ी के कुंदे अग्नि उत्पत्ति में सहायक होते हैं। जहाँ अग्नि एवं शमी की पवित्रता एवं उपयोगिता की ओर मंत्रसिक्त संकेत हैं। इस उत्सव का सम्बंध नवरात्र से भी है क्योंकि इसमें महिषासुर के विरोध में देवी के साहसपूर्ण कृत्यों का भी उल्लेख होता है और नवरात्र के उपरांत ही यह उत्सव होता है। दशहरा या दसेरा शब्द 'दश' (दस) एवं 'अहन्‌‌' से ही बना है।

विजयादशमी के दस सूत्र

रावण दहन, रामलीला, मथुरा

दस इन्द्रियों पर विजय का पर्व है।

असत्य पर सत्य की विजय का पर्व है।

बहिर्मुखता पर अंतर्मुखता की विजय का पर्व है।

अन्याय पर न्याय की विजय का पर्व है।

दुराचार पर सदाचार की विजय का पर्व है।

तमोगुण पर दैवीगुण की विजय का पर्व है।

दुष्कर्मों पर सत्कर्मों की विजय का पर्व है।

भोग पर योग की विजय का पर्व है।

असुरत्व पर देवत्व की विजय का पर्व है।

जीवत्व पर शिवत्व की विजय का पर्व है।

 

 

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