जानिए क्यों मनाया जाता है लोहड़ी का त्योहार

लोही या लाई के नाम से भी जानी जाती है लोहड़ी

ARPITA KATIYAR | Published On: Jan 12, 2018 06:31 PM IST | Updated On: Jan 12, 2018 06:32 PM IST |   263

नई दिल्ली।

उत्तरी भारत का प्रसिद्ध त्योहार 'लोहड़ी' पौष महीने के आखिरी दिन बड़ी धूमधूाम से मनाया जाता है। लोहड़ी का मुख्य संबंध पंजाब प्रांत से जुड़ा है जो लोही या लाई के नाम से भी जानी जाती हैं। लोहड़ी शब्द ल (लकड़ी) +ओह (गोहा = सूखे उपले) +ड़ी (रेवड़ी) से मिलकर बना है इसलिए रात को खुले स्थान में परिवार व आस-पास के लोग मिलकर आग के किनारे घेरा बनाकर बैठते हैं और उसमें मूंगफली, रेवड़ी, गुड़, चिड़वे, तिल आदि का अर्क देते हैं और खाते हैं। वैसे तो हर घर में इस त्योहार की रौनक होती हैं लेकिन नवजन्में बच्चे व नई शादी वाले घर की लोहड़ी का जश्न कुछ खास होता है।

पारंपरिक तौर से भी मनायी जाती है लोहड़ी

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पारंपरिक तौर पर लोहड़ी फसल की बुआई और उसकी कटाई से जुड़ा एक विशेष त्योहार है। इस दिन पंजाबी लोग अलाव जलाकर उसके चारों ओर नृत्य करते हैं। लड़के जहां भांगड़ा पाते हैं, वहीं लड़कियां और महिलाएं गिद्धा नृत्य करती है। लोहड़ी के अलाव के आसपास लोग इकट्ठे होकर दुल्हा भट्टी का प्रशंसा गायन भी करते है, जो पंजाब के लोक पात्र हैं। इस पर्व को मनाने के पीछे एक विश्वास यह भी है लोहड़ी का जन्म होलिका की बहन के नाम पर हुआ था। लोग मानते हैं कि होलिका की बहन बच गई थी, हालांकि होलिका खुद आग में जल कर मर गई। अनेक किसान इस दिन से अपने नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के रूप में लोहड़ी मनाते हैं।

ऐतिहासिक कहानियों से जुड़ा इस त्योहार का संबंध

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इस त्योहार का संबंध कई ऐतिहासिक कहानियों से जुड़ा हैं लेकिन सबसे प्रमुख लोककथा दूल्ला-भट्टी की है जो मुग़ल शासक के समय का एक बहादुर योद्धा था। कहा जाता हैं कि उस समय लड़कियों को गुलामी के लिए अमीर लोगों को बेच दिया जाता था। उन्हीं में से थी दो अनाथ बहनें सुंदरी और मुंदरी। दूल्ला भट्टी ने इन दोनों लड़कियों को छुड़वाया और आग जलाकर सुंदरी और मुंदरी की शादी करवाई और शगुन में शक्कर दी। इसी कथा से जुड़ा गीत लोहड़ी के दिन गाया जाता है जो आज भी लड़के लड़कियां लोहड़ी मांगते हुए इसे गाते हैं।

सुंदर, मुंदरिये हो,
तेरा कौन विचारा हो,
दूल्ला भट्टी वाला हो,
दूल्ले धी (लड़की) व्याही हो,
सेर शक्कर पाई हो।

 

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