जाने कितना ताकतवर है ईरान, जो बार-बार अमेरिका को दे रहा है चुनौती

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नई दिल्ली: सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हमले के बाद अमेरिका और ईरान के बीच फिर तनाव बढ़ गया है. अगर अमेरिका इस हमले के लिए ईरान को कठघरे में खड़ा कर रहा है तो ईरान ने इस दावे को खारिज करने के साथ फिर अमेरिका को युद्ध के लिए चुनौती दी है. इस हमले के बाद खाड़ी में युद्ध का खतरा फिर गहरा गया है, जिस तरह ईरान बार-बार अमेरिका को चुनौती दे रहा है और निडर लग रहा है, आखिर उसकी वजह क्या है. आखिर ईरान के पास कितनी ताकत है, जो वो अमेरिका से लोहा लेने को तैयार भी है और युद्ध के हालात बनने के समय में भी किसी समझौते के लिए राज़ी नहीं दिख रहा.

ईरान की सैन्य क्षमताओं के बारे में आपको विस्तार से जानने से पहले यह जानना चाहिए कि फिलहाल ईरान किन परिस्थितियों में है. शिया बहुल आबादी वाले ईरान के चारों तरफ माहौल ऐसा है कि ईरान खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है. ईरान एक तरफ अमेरिका की फौजों के साथ ही इज़राइल और सुन्नी बहुल आबादी वाले सऊदी अरब से घिरा है और मौका पड़ने पर ये दोनों अमेरिका के साथ हो सकते हैं. दूसरी तरफ, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के कारण ईरान के पास अपने खुद के ही हथियार ज़्यादा हैं, बाहरी तकनीक वाले कम. अब जानें कि क्या और कितनी है ईरान की ताकत.

ईरान की सेना के आंकड़े
जल, थल और वायुसेना में कुल 5 लाख 34 हज़ार से ज़्यादा सैन्य क्षमता वाले ईरान की कुल आबादी 8 करोड़ से ज़्यादा है. इतनी आबादी के साथ ईरान की अंदरूनी क्षमता इस लायक है कि वो लंबा युद्ध लड़ सकता है. ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के मुताबिक दुनिया के 136 देशों की सेना की लिस्ट में ईरान 13वें नंबर पर सबसे बड़ी सेना रखने वाला देश है. इसके अलावा, 2017 में ईरान ने 16 अरब डॉलर का रक्षा बजट रखा था, जो उसके पड़ोसी देशों के मुकाबले कम ही है.

इज़राइल का रक्षा बजट साढ़े 18 अरब डॉलर का रहा, जबकि उसे अमेरिका से साढ़े तीन अरब डॉलर की रक्षा मदद अलग से हासिल हुई. इसी तरह, सऊदी अरब का रक्षा बजट करीब 77 अरब डॉलर का रहा है और अमेरिका का रक्षा बजट बहुत ज़्यादा 600 अरब डॉलर का रहा है. ऐसे में ईरान को काफी पीछे माना जा सकता है.

ये हैं ईरान के दोस्त और हमदर्द
सैन्य क्षमताओं के लिहाज़ से ईरान की सबसे कारगर रणनीति फॉरवर्ड डिफेंस है. इस डिफेंस का नेतृत्व ईरान का कुद्स बल करता है जबकि उसके साथ उसके क्षेत्रीय सहयोगी भी मदद करते हैं. इस नीति के तहत ईरान की ज़मीन के बाहर ही उसके सहयोगी दुश्मनों को रोकने और कमज़ोर करने का काम करते हैं. ईरान के खास सहयोगियों में सीरिया के साथ ही, लेबनान के हिज़बुल्ला जैसे शिया समूह, यमन के हौती बागी और फिलिस्तीन के इस्लामी जिहादी शामिल हैं.

ईरान मध्य पूर्व के उन कुछ देशों में शामिल है, जो गाज़ा पट्टी पर सक्रिय फिलिस्तीनी हमस समूह के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए ज़ोर लगा रहे हैं. ईरान के ये सहयोगी अपने राजनीतिक हितों के लिए एक दूसरे के साथ सहयोग भाव रखते हैं.

ईरान की मिसाइलें और परमाणु क्षमता
अब तक जो विश्लेषण हुए हैं, उनमें से डीडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के पास कम, मध्यम और अच्छी रेंज तक हमला करने वाले बैलेस्टिक मिसाइलें हैं, जिनके ज़रिए इज़राइल, खाड़ी के अरब देश और मध्य पूर्व में अमेरिकी सेना के ठिकानों सहित यूरोप के कुछ हिस्सों तक ईरान हमला कर सकता है. साथ ही, ईरान की परमाणु क्षमता को लेकर भी दुनिया में कयास और दहशत की खबरें आ चुकी हैं, लेकिन ईरान यही कहता रहा है कि वह अपनी रक्षा के लिए परमाणु क्षमता विकसित कर रहा है.


इंटरनेशनल क्राइसिस समूह के मुताबिक ईरान का कहना रहा है कि उसकी ये क्षमता केवल इज़राइल और मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य बेसों के हमले से खुद को बचाने के लिए है. लेकिन ईरान के इस डिफेंस सिस्टम को उसके दुश्मन हमले की धमकी के तौर पर मानते रहे हैं.

युद्ध की स्थिति में ईरान अपने फॉरवर्ड डिफेंस के साथ बैलेस्टिक मिसाइलों की नीति को शामिल कर सकता है. ये भी कहा जाता है कि ईरान हिज़बुल्ला और हौती जैसे समूहों को भी ​मिसाइल मदद कर रहा है और कर सकता है, लेकिन ईरान इन दावों को खारिज करता रहा है.

दुनिया की अर्थव्यवस्था की चाबी ईरान के पास है!
अगर युद्ध के हालात बनते हैं तो ऐसे में ईरान की साफ चेतावनी समझी जाती है कि वो तेल रोककर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार सकता है. दुनिया में तेल के कुल प्रवाह का पांचवा हिस्सा फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच होरमुज़ के रास्ते जाता है. युद्ध के हालात में ईरान माइन्स और कुछ आक्रामक नौसेना तरकीबों के ज़रिए इस रास्ते को चोक कर सकता है.

युद्ध के हालात के मद्देनज़र ईरान ये भी कर सकता है कि वह तेल रोकने की इस नीति को यमन और हौती सहयोगियों के साथ मिलकर उनसे भी ऐसा करने को कहे. ऐसा होता है तो लाल सागर में बाब अल—मंदाब का रास्ता भी रोका जा सकता है, जहां से दुनिया का करीब 4 फीसदी तेल गुज़रता है. तेल कारोबार की बड़ी चाबी ईरान के हाथ में है और यह उसकी सबसे खास रणनीतिक ताकतों में शुमार है.