गलसुआ के दर्द से कैसे बचें? जानें लक्षण और बचाव के उपाय

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गलसुआ या कनफेड, जिन्हें अंग्रेजी में मम्प्स कहते हैं, एक विषाणुजनित रोग है। यह पैरोटिड ग्रंथि में संक्रमण की वजह से होता है। संक्रमण की वजह से इस ग्रंथि में सूजन आ जाती है। पैरोटिड ग्रंथि कान के नीचे तक होती है और मुंह में लार और थूक बनाती है। गलसुआ कोई हवा से फैलने वाला रोग नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में विषाणु की वजह से फैलता है।

आमतौर पर यह परेशानी बचपन से युवावस्था में होती है, लेकिन इसकी कोई उम्र नहीं है। इस रोग के लक्षण बहुत बाद में जाकर दिखाई देते हैं। हालांकि यह कोई गंभीर बीमारी नहीं है, लेकिन फिर भी जब यह संक्रमण होता है तो चेहरा तो भद्दा लगता ही है, गालों और गर्दन में असहनीय दर्द भी होता है। इस दर्द की वजह से न तो आप खुल कर हंस पाते हैं और न ही ठीक से भोजन खा पाते हैं।

लक्षण

इसके लक्षण बहुत जल्दी दिखाई नहीं देते हैं। जब संक्रमण पूरी तरह से फैल जाता है, तब लक्षण दिखते हैं। इसके लक्षण वायरस के संपर्क में आने के लगभग पंद्रह से बीस दिन में दिखाई देते हैं।

बुखार : गलसुआ के लक्षणों में पहला लक्षण है बुखार। जैसे ही गलसुआ की शुरुआत होती है वैसे ही बुखार आने लगता है।

सिर दर्द, भूख न लगना : इस रोग के होने पर सिर में दर्द और भूख न लगने जैसी समस्याएं आती हैं।

चबाने और निगलने में समस्या : गलसुआ होने पर खाना चबाने और उसे निगलने में अधिक समस्या का सामना करना पड़ता है। मुंह खोलने वाली ग्रंथि में भी दर्द होने लगता है।

सूजन : गालों के साथ-साथ गर्दन तक सूजन आ जाती है। कई बार सिर्फ एक तरफ की ग्रंथि में सूजन आती है। साथ ही कान के पीछे की ग्रंथि में भी सूजन आने की वजह से मुंह नहीं खुलता।

प्रजनन क्षमता : गलसुआ के कारण पुरुषों के अंडकोष में दर्द और प्रजनन क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कभी-कभी स्तन, दिमाग की झिल्ली और दिमाग में भी सूजन आ जाती है। हालांकि इस तरह की समस्याओं की आशंका काफी कम होती है। यह समस्या बढ़ने पर अस्थायी रूप से बहरेपन की समस्या भी हो सकती है।

गर्दन में जकड़न : गलसुआ होने पर गर्दन और गालों में सूजन आ जाती है। इस वजह से गर्दन जकड़ जाती है और गर्दन को ठीक से हिला नहीं पाते।

गलसुआ और टांसिल

अक्सर लोग गलसुआ और टांसिल के बीच अंतर नहीं कर पाते। गलसुआ एक संक्रामक रोग है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में आसानी से फैलता है। यह संक्रमण संक्रमित लार, छींकने या खांसने और संक्रमित व्यक्ति के साथ बर्तन साझा करने से फैलता है। इस रोग में जबड़े में सूजन दिखाई देती है। कई बार डॉक्टर भी गलसुआ और टांसिल के लक्षणों को पहचानने में गलती कर बैठते हैं। गलसुआ की पहचान के लिए रक्त की जांच की जाती है। रक्त में एंटीबॉडी की उपस्थिति आसानी से वायरल संक्रमण की पुष्टि कर देता है।

बचाव

यों तो गलसुआ का कोई विशिष्ट उपचार नहीं है, क्योंकि दस-बारह दिन में यह अपने आप ही ठीक हो जाता है। पर गलसुआ होने पर दर्द बहुत अधिक होता है। इस दर्द को कम करने के लिए डॉक्टर दर्द निवारक दवाएं देते हैं। गलसुआ होने पर निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

  •  खाने में तरल पदार्थों का सेवन करें।
  • मुंह की सफाई विशेषतौर पर करें।
  •  गालों की बर्फ या फ्रोजन मटर से सिंकाई करें।
  •  यह रोग वायरस से होता है, इसलिए इसमें अधिक पानी पीने की सलाह दी जाती है।
  •  गुनगुने पानी के गरारे करने से दर्द में आराम मिलता है।
  •  रोगी को अम्लीय पदार्थ और फलों के सेवन से बचना चाहिए।
  •  रोगी को आराम करना चाहिए।
  •  जिन बच्चों को यह रोग न हो उसके लिए एमएमआर नामक टीका लगवाएं। यह पंद्रह माह तक के बच्चे को लगता है।