मेरे शरीर का प्रत्येक कण और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के लिए समर्पित : डॉ. आंबेडकर

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नई दिल्ली : ‘‘मैं हिंदू धर्म छोड़ दूंगा। हिंदू समाज में जो विकृति आ गयी है, उन विकृतियों के लिए मेरा विरोध है, परंतु मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूं। मैं जीऊंगा तो हिंदुस्तान के लिए और मरूंगा तो हिंदुस्तान के लिए। मेरे शरीर का प्रत्येक कण और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के लिए काम आये, इसलिए मैं जन्मा हूं।

मैं हिंदु धर्म छोड़ दूंगा, परंतु ऐसे धर्म को अंगीकर करूंगा, जो हिंदुस्तान की धरती पर जन्मा है। मुझे ऐसा ही धर्म स्वीकार है, जो विदेशों से आयात किया हुआ नहीं हो। इसी कारण मैं बौद्ध धर्म अंगीकर करता हूं। इसके बाद उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया’’। ऐसे थे हमारे संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर।

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हैदराबाद के निजाम डॉ साहेब के चरणों में स्वर्ण मुद्रा का ढेर लगा देने को तैयार था। दोनों धर्म के लोग उन्हें अपने पक्ष में लाने के लिए पीछे पड़ गये थे। उस समय उन्होंने ये बात कही थी। देश भक्ति की यह उच्च पराकाष्ठा है। बाबा साहेब ने दलितों को अस्पृश्यता की यातनाओं से मुक्ति दिलाने के लिए राष्ट्रद्रोह नहीं किया, न धर्म द्रोह किया।

राष्ट्र और समाज के विषय में हमलोग भाग्यशाली हैं। हमारे पास हजारों वर्षों का इतिहास, संस्कृति और मानव सभ्यता की विरासत है। बीते वर्षों का प्रत्येक पल हमारे लिए प्ररेणा का अविरल स्रोत प्रवाहित करता रहा है। भारत की भूमि पर भारत माता की कोख से अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है़ डॉ बाबा साहेब आंबेडकर का उनमें एक महत्वपूर्ण स्थान है।

महान विचारक, कर्मयोगी, मन से-वचन से-कृति से निरंतर संघर्षरत डॉ साहब की गणना उन महापुरुषों में होती है, जिनके व्यक्तित्व, कृतित्व ने न केवल इतिहास में अपना स्थान बनाया, बल्कि उस काल के घटनाचक्र को भी एक निश्चित दिशा दी। डॉ बाबा साहेब ने अछूत और निम्न वर्ग के मानव की समता के लिए समाज में एक चिंगारी प्रकट की। बाबा साहेब अांबेडकर निर्भय क्रांतिवीर थे।

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भारत के उस कालखंड में व्याप्त कुरीतियों से उन्होंने दलित समाज को ऊपर उठाया था, परंतु किसी बदले की भावना से नहीं। उन्होंने दूसरों को मार–काट कर बड़ा होने की बात कभी नहीं की। डॉ बाबा साहेब एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जो वंचितों के लिए लड़ते थे। वे दलितों के अधिकार के लिए लड़ते थे, उनके स्वाभिमान और सम्मान के लिए जूझते थे। दलितों के बीच बैठ कर उन्हें कड़वी से कड़वी, कठोर से कठोर बात कोई कह सकता था,

ऐशोआराम को छोड़कर देशवासियों की सेवा में जीवन किया अर्पित

बाबा साहेब आंबेडकर ने इंग्लैंड की धरती पर रह कर डिग्रियां प्राप्त कर ली थी। इन डिग्रियों के आधार पर वे चाहते तो रुपयों का ढेर लग जाता, परंतु उन्होंने यह सब छोड़ दिया। बैरिस्टर बने थे। इसके बाद भी उन्होंने इंग्लैंड के पाउंड को ठोकर मार दी और कहा कि मैं तो अपने देशवासियों की सेवा में जीवन अर्पित कर दूंगा। उन्हें स्वयं की नहीं, समाज की चिंता थी।

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देश हित के आगे त्यागा मंत्री पद

डॉ बाबा साहब, पं नेहरू के मंत्रिमंडल में कानून मंत्री थे, परंतु उनके ह्दय में तो समाज हित की अखंड धारा प्रवाहित हो रही थी। इसी कारण वे मंत्री पद त्याग कर समाज के काम पर निकल पड़े। बाबा साहेब को भारत रत्न पुरस्कार मिले, इसके लिए हम सबको आंदोलन करना पड़ा, इससे बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं हो सकता।

‘शिक्षित बनो’ का दिया नारा

बाबा साहेब की दूसरी विशिष्टिता थी कि वे कहते थे– ‘‘शिक्षित बनो’’, परंतु जब तक वे स्वयं शिक्षित नहीं हुए, तब तक उन्होंने यह उपदेश किसी को नहीं दिया था। शिक्षित होने के बाद ही उन्होंने शिक्षित बनो का नारा दिया। यही एक मात्र सही मार्ग है। डॉ बाबा साहेब के जीवन को जानने का, पढ़ने का, अध्ययन करने का, मनन–चिंतन का संकल्प करें। आप देखेंगे कि इस महामानव के जीवन में से आपको जीने की एक नयी दिशा प्राप्त होगी।

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सामाजिक न्याय के लिए आंबेडकर के प्रयासों ने उन्हें महान बनाया : UN

संयुक्त राष्ट्र के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि वंचित व पिछड़े वर्ग को राजनीतिक और सामाजिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में भीमराव आंबेडकर द्वारा किये गये ‘‘अथक प्रयासों’’ ने दुनिया में उन्हें एक महान ‘‘प्रवर्तक’’ बनाया और समानता और सामाजिक न्याय की उनकी दृष्टि की छाप संयुक्त राष्ट्र के 2030 विकास एजेंडे में झलकती है।

आंबेडकर के 127 वें जयंती के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन द्वारा संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में अपने संबोधन में डेवलपमेंट प्रोग्राम ऐडमिनिस्ट्रेटर अकीम स्टेनर ने कहा कि सतत विकास अंबेडकर की ‘‘समतावादी दृष्टि’’ का मूल मर्म था। उन्होंने कहा, ‘‘आंबेडकर समझते थे कि समाज में बढ़ती असमानताएं राष्ट्र और लोगों के आर्थिक और सामाजिक कल्याण के लिए बुनियादी चुनौतियां पैदा करती है।’’

स्टेनर ने कहा, ‘‘वंचित व दलित समुदायों को राजनीतिक व सामाजिक रूप से सशक्त बनाने, ताकि श्रमिकों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार हो और समाज के हरेक व्यक्ति को शिक्षा मिले , इस दिशा में उनके द्वारा किये गये अथक प्रयासों ने उन्हें भारत और अन्य देशों में एक प्रवर्तक के रूप में पहचान दी है’’

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