स्कूल छोड़ने को मजबूर एलजीबीटी समुदाय के बच्चे

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भारत के दक्षिण में स्थित चेन्नई में रहने वाली एक ट्रांसजेंडर लड़की शेम्बा शुरू में लड़के की तरह दिखती थी. छह साल की उम्र में लड़की की तरह चलने पर स्कूल के साथियों ने छेड़खानी की. जब 10 साल की उम्र में उसने लड़कियों जैसे कपड़े पहनने शुरू किए तो उसके ऊपर पत्थर फेंके गए. इस वजह से उसने स्कूल जाना छोड़ दिया, वकील बनने का अपना सपना त्याग दिया. अब इस बात की संभावना ज्यादा बढ़ गई है कि भविष्य में वह या तो भीख मांगेगी या सेक्स वर्कर के तौर पर काम करेगी.

शेम्बा ने कहा, “उन्होंने मेरे सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं छोड़ा. मुझे लगता है कि मैं जो कर रही थी वो मेरे लिए बिल्कुल सामान्य बात थी. लेकिन मेरे साथ पढ़ने वालों के लिए यह बिल्कुल असामान्य बात थी. पहले मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए. बाद में जब उन्होंने मेरे ऊपर पत्थर फेंकने शुरू किए, तो मैंने स्कूल नहीं जाने का फैसला किया.” यह कहानी सिर्फ एक शेम्बा की नहीं है. यूनेस्को द्वारा तमिलनाडु में एलजीबीटी समुदाय के 400 लोगों के बीच किए गए एक सर्वे के अनुसार, डर की वजह से आधे से अधिक ने क्लास में जाना छोड़ दिया और एक तिहाई ने स्कूल छोड़ने का फैसला किया.

शोषण की अनगिनत घटनाएं

एलजीबीटी समुदाय के बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार में बलात्कार, छेड़छाड़, मार-पीट, कमरे में बंद कर देना, उनके सामान चोरी कर लेना और उनके बारे में भद्दी अफवाहें फैलाना शामिल है. एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था सहोदरन ने सर्वे में यूनेस्को की मदद की है. सहोदरन की सदस्य और ट्रांसजेंडर जया गुणसेलेन कहती हैं, “हम जानते हैं कि दुर्वयवहार होता है लेकिन जो आंकड़े आए हैं, वे हैरान करने वाले हैं. यहां तक कि मुझे स्कूल में धमकाया गया था. लेकिन कुछ लोगों की बातें सुन मैं हैरान रह गई. वे बदमाशों के गिरोह और शारीरिक शोषण करने वालों के बारे में बताते हैं. हालांकि कुछ पीड़ितों ने शर्मिंदगी की वजह से हिंसा के निशान छिपा लिए.”

तमिलनाडु राज्य शिक्षा विभाग ने कहा कि यहां पहले से ही छात्रों के लिए एक हॉटलाइन है, जो परामर्श प्रदान करता है. राज्य सरकार यौन और लिंग विविधता के आधार पर धमकाने जैसे मामलों पर अंकुश लगाने की नीति को मजबूत करने की योजना बना रही है. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2018 में समलैंगिकता को मान्यता देने के ऐतिहासिक फैसले के बावजूद भारत के एलजीबीटी समुदाय को अक्सर उनके परिवारों द्वारा अस्वीकार कर दिया जाता है. उन्हें नौकरी मिलने में परेशानी होती है. ऐसे में वे सेक्स वर्कर बनने या भीख मांगने के लिए मजबूर होते हैं.

ट्रांसजेंडरों के लिए नए बिल में बदलाव

वर्ष 2018 में ट्रांसजेंडरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए लोकसभा में बिल पास किया गया था लेकिन उस समय यह निरस्त हो गया था. अब इस साल इसे फिर से संसद में पेश किया जाना है लेकिन मसौदे में दो अहम बदलाव किए गए हैं. पहला ये है कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की मान्यता के लिए जिला स्क्रीनिंग कमेटी के गठन की आवश्यकता वाले हिस्से को हटा दिया है.

इस कमेटी में मुख्य चिकित्सा अधिकारी, सामाजिक कल्याण अधिकारी, मनोवैज्ञानिक, ट्रांसजेंडर समुदाय का प्रतिनिधि और सरकार द्वारा नामांकित एक व्यक्ति होता था. अब लोग स्वयं ही अपनी पहचान ट्रांसजेंडर के रूप में कर सकेंगे और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा एक प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा. दूसरा बदलाव ये है कि अब तक ट्रांसजेंडरों द्वारा भीख मांगने के काम को अपराध माना जाता रहा है लेकिन नए बिल के अनुसार ये अपराध नहीं माना जाएगा.