सबरीमाला मंदिर मामला: फैसले पर तत्‍काल रोक लगाने और जल्द सुनवाई से SC का इनकार

0
92

नई दिल्‍ली: सबरीमाला मंदिर मामले में संविधान पीठ के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया है। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका पर नियमित प्रक्रिया के तहत ओपन कोर्ट में नहीं बल्कि चैंबर में सुनवाई होगी, जहां न कोई पक्षकार होगा और न ही उनके वकील होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर तत्काल रोक लाने से भी इनकार किया है। दरअसल, याचिकाकर्ता के वकील मैथ्यू निदुमपारा ने सीजेआई बेंच से मंगलवार को पुनर्विचार पर जल्द सुनवाई और फैसले पर तत्काल रोक लगाने की मांग की, जिसे कोर्ट ने ठुकरा दिया। आपको बता दें कि नेशनल अयप्पा डिवोटी एसोसिएशन संस्था सहित तीन पुनर्विचार याचिका अब तक सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हो चुकी है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का फैसला केरल के लोगों की धार्मिक भावनाओं के पहलू को अनदेखा कर दिया गया है, ऐसे में कोर्ट का 28 सितंबर का फैसला असंवैधानिक है। इसलिए कोर्ट अपने फैसले पर पुनर्विचार करे। 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में एक और अहम फैसला सुनाते हुए केरल के सबरीमाला मंदिर के दरवाजे सभी महिलाओं के लिए खोल दिया था।

कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक का नियम रद करते हुए कहा था कि यह नियम महिलाओं के साथ भेदभाव है और उनके सम्मान व पूजा अर्चना के मौलिक अधिकार का हनन करता है। शारीरिक कारणों पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना गलत है। केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी। इसके पीछे मान्यता थी कि इस उम्र की महिलाओं को मासिकधर्म होता है और उस दौरान महिलाएं शुद्ध नहीं होतीं।

मंदिर के भगवान अयैप्पा ब्रह्मचारी स्वरूप में हैं और इस उम्र की महिलाएं वहां नहीं जा सकतीं। इस रोक को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी गई थी। यह फैसला पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ ने चार-एक के बहुमत से सुनाया था। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविलकर, आरएफ नारिमन, और डीवाई चंद्रचूड़ ने बहुमत से फैसला देते हुए रोक के नियम को असंवैधानिक ठहराया था।

हालांकि पीठ की पांचवी सदस्य न्यायाधीश इंदू मल्होत्रा ने असहमति जताते हुए रोक के नियम को सही ठहराया था और कहा था कि अयैप्पा भगवान के सबरीमाला मंदिर को एक अलग धार्मिक पंथ माना जाएगा और उसे संविधान के अनुच्छेद 26 में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में संरक्षण मिला हुआ है। वह अपने नियम लागू कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने स्वयं और जस्टिस खानविल्कर की ओर से दिए गए फैसले में पुराने समय से महिलाओं के साथ चले आ रहे भेदभाव का जिक्र करते हुए कहा था कि उनके प्रति दोहरा मानदंड अपनाया जाता है।