अखिलेश-मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस आज, गठबंधन का ऐलान संभव, पोस्टरों और झंडों से पटा लखनऊ

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लखनऊ। लोकसभा चुनाव से पहले सपा और बसपा आज अपने गठबंधन की घोषणा कर सकते हैं। दोपहर 12 बजे एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह घोषणा हो सकती है। इससे पहले लखनऊ की मुख्य सड़कें अखिलेश और मायावती के पोस्टरों के अलावा दोनों दलों के झंडों से सज गईं हैं।

भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए एक बार फिर दो बड़ी राजनीतिक पार्टियां गठबंधन करने जा रही हैं। दो वर्ष पूर्व विधानसभा चुनाव से पहले राजधानी लखनऊ के पांच सितारा ताज होटल में अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने “यूपी के लड़के” और “यूपी को यह साथ पसंद है” नारे के साथ चुनावी गठजोड़ किया था।

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अब लोकसभा चुनाव के मद्देनजर शनिवार को उसी होटल में अखिलेश यादव, मायावती से चुनावी गठबंधन करने जा रहे हैं। इस बीच कन्नौज में अखिलेश ने बसपा से गठबंधन होने की पुष्टि भी की है। सपा का तकरीबन ढाई दशक पहले बसपा से गठबंधन करने का फार्मूले हिट रहा था।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती शनिवार को संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में एक साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने का एलान करेंगे। प्रदेश की राजनीति में धुर विरोधी माने जाने वाले सपा-बसपा का ढाई दशक बाद एक मंच पर आना सूबे की सियासत का बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक, शनिवार को पहली बार आयोजित साझा पत्रकार वार्ता में मायावती और अखिलेश मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने और गठबंधन में अन्य समान विचारधारा वाले छोटे दलों को भी शामिल करने की घोषणा कर सकते हैं। हालांकि, सीटों के बंटवारे का विस्तृत ब्योरा बाद में ही सामने आने की उम्मीद है।

कांग्रेस को अलग रखकर बनाए जा रहे गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल, निषाद पार्टी, पीस पार्टी, सुभासपा व अपना दल जैसे स्थानीय दलों को भी जगह मिल सकती है। बशर्ते, इनके बीच सीट बंटवारे का गणित फिट बैठ जाए। सपा व बसपा में गठबंधन को लेकर चार जनवरी को दिल्ली में मायावती के आवास पर अखिलेश से हुई लंबी वार्ता में सहमति बन चुकी है।

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कांग्रेस को गठबंधन में साथ लेने के बजाए अमेठी व रायबरेली संसदीय क्षेत्रों में वाक ओवर देने का निर्णय भी हो चुका है। रालोद को साथ में लेने पर बनी सहमति में सीटों का पेंच फंसा है। मंगलवार को अखिलेश से मिले रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने पांच सीटों पर दावेदारी जताई थी लेकिन दो-तीन सीटें ही मिलने की उम्मीद से बात आगे नहीं बढ़ी।

1993 जैसे करिश्मे की आस

नब्बे के दशक में राम लहर पर बेक्र लगाने का काम भी सपा-बसपा गठबंधन ने किया था। तब बसपा के संस्थापक कांशीराम और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने मिलकर 1993 में विधानसभा चुनाव लड़ा था। बाबरी ढांचा गिरने के बाद भाजपा का सत्ता में वापसी का ख्वाब भी टूट गया था। अब 25 वर्ष बाद मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव और कांशीराम की उत्तराधिकारी मायावती एक बार फिर से भाजपा को रोकने के लिए एका कर रहे हैं।