सुप्रीमकोर्टः तब रूम नं.4 और अब 6 बना मिड नाइट हियरिंग का गवाह

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नई दिल्ली। कर्नाटक पर फैसला देने के लिए रात भर चली सुप्रीम कोर्ट देश की न्यायिक व्यवस्था के इतिहास की एक बार फिर इबारत लिख रहा था। इससे पहले याकूब मेमन को फांसी देने का फैसला के दौरान रात में सुप्रीमकोर्ट खोली गयी थी। देश की सर्वोच्च अदालत के सामने दो साल के भीतर दो ऐसे मौके आए जब देर रात कोर्ट खुलवाकर याचिका पर सुनवायी करनी पड़ी। पहला मौका था 2015 में मुंबई बम विस्फोट केस में याकूब मेमन की फांसी रुकवाने की याचिका पर सुनवायी का तो दूसरा कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद का शपथ का मामला। तब सुप्रीमकोर्ट का रूम नंबर-4 बना था मिड नाइट हियरिंग का गवाह और अब रूम नंबर-6 गवाह बना। 17 मई 2018 को देर रात सुनवायी और जजों की बेंच गठित करने का आदेश करने वाले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा 2015 में खुद याकूब मेमन को फांसी देने वाले जज थे।

मुंबई बम विस्फोटों के दोषी याकूब मेमन के मौत के वांरट पर रोक लगाने के लिए उसके वकीलों की ओर से दायर की गई याचिका खारिज सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार तड़के (अर्द्ध रात्रि) खारिज कर दी। तीन न्यायाधीशों वाली पीठ के अध्यक्ष दीपक मिश्रा ने अदालत कक्ष संख्या 4 में एक आदेश में कहा कि मौत के वारंट पर रोक लगाना न्याय का मजाक होगा। याचिका खारिज की जाती है। सुनवाई के लिए अदालत कक्ष अभूतपूर्व रूप से बुधवार रात में खोला गया। गुरुवार तड़के तीन बजकर 20 मिनट पर शुरू हुई सुनवाई 90 मिनट तक चली। कर्नाटक मुद्दे पर सुप्रीमकोर्ट में रात 1.45 से रूम नंबर 6 में सुनवायी चली।

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