प्लास्टिक को ठेंगा दिखाया, ओडिशा में अब ठुंगा

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भुवनेश्वर 9 सितंबर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयन्ती से राज्य में प्लास्टिक को अलविदा कह दिया गया। दुकानदारों और लोगों ने प्लास्टिक से किनारा करना शुरू कर दिया। इसी के साथ ओडिशा में एक बार फिर चिरपरिचित ठुंगा का चलन शुरू हो गया। ज्यादातर दुकानदार अब ग्राहकों को पॉलीथिन में सामान नहीं देते हैं। अब वे कागज के ठुंगा में सामान रखकर दे रहे हैं। सखी संस्था की अध्यक्ष स्वीटी साहू का कहना है कि ठुंगा प्रचलन से तीन फायदे हो रहे हैं। एक तो ठुंगा उद्योग को बढावा मिलने से कई गरीब लोगों को काम मिलने लगा है, दूसरा पुराने अखवारों के दाम बढने लगे है, तीसरे में प्रकृति की सुरक्षा व पॉलीथिन खाकर मौत के मुह में जाने वाले मवेशियों का जान बचने की संभावना दिखने लगी है।
ठुंगा बनाने वाली कारीगर फिर सक्रिय हो गए हैं। जगतसिंहपुर जिले में इस समय 25 हजार से भी कहीं ज्यादा ठुंगा कारीगर ठुगा बनाने में लगे हुए हैं। ठुंगा उद्योग की खासियत यह है कि इसमें ज्यादा पूंजी लगाने की जरूरत नहीं है। पुराना पेपर ओर गोंद, बाकी कारीगरी। डीडीके बस्ती की रमा पाल कहती हैं कि उन्हे एक ठुंगा बेचने पर दो रूपये मिलते हैं। इसलिए दूसरे काम के तुलना में ठुंगा बनाने में अच्छा फायदा है। जगतसिंहपुर के जिला सप्लाई व मर्केटिंग सोसाइटी (डीएसएमएस) के सत्य सुन्दर पाईटाल का कहना है कि ठुंगा उद्योग जिस तरह बढ रहा है उससे अब जिले के डीआरडीए की ओरसे इस उद्योग को आर्थीक सहायता देने पर विचार किया जाने लगा है।
एक स्वयंसेवी संगठन चेस्टा ने कपडे के बैग के अधिक प्रचलन के लिए झोपडपट्टी में रह रही महिलाओंको कपड़ा बैग बनाने का प्रशिक्षण दिया। इसमें स्थानीय शिखर चंडी वस्ती की 40 महिलाओं ने प्रशिक्षण के बाद बस्ती के लोगों के पुराने कपड़े को लेकर, उसे साफ करके बैग बनाना शुरू किया है। बैग के डिजाइन के लिए वह इंटरनेट का सहारा ले रही हैं। एक महिला दिन में 10 बैग तक तेयार कर लेती हैं।