‘पृथ्वी’ की आकाश उड़ान का स्वर्णिम इतिहास

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कलाम ने चुना था मिसाइल टेस्ट को ओडिशा का चांदीपुर

एक मिसाइल टीपू सुलतान के नाम पर तैयार होनी चाहिए

बालासोर (विप्र)। भारतीय रक्षा प्रणाली में मिसाइल का इतिहास किसी भी देश के मुकाबले में कम नहीं है। यूं तो ओडिशा के बालासोर जिला के समुद्र तट चांदीपुर में आए दिन मिसाइल टेस्ट होते रहते हैं पर पृथ्वी श्रृंखला की मिसाइल का सफल परीक्षण होता है तो मीडिया में सुर्खियां बन जाती है। श्रेय जाता है भारतीय मिसाइल के जनक डा.एपीजे अब्दुल कलाम को। उन्हीं के नाम पर बालासोर केचांदीपुर में एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप है जहां मिसाइल परीक्षण किया जाता है।

थोड़ा पीछे जाएं तो 25 फ़रवरी 1988 की सुबह 11.23 पर पृथ्वी मिसाइल के सफल परीक्षण ने भारतीय रक्षा प्रणाली के विकास क्रम में एक नया अध्याय जोड़ दिया था। यह सिर्फ़ ज़मीन से ज़मीन मार करने वाली मिसाइल नहीं थी जो 1000 किलोग्राम के भार (बारूद) को लेकर 150 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता रखती थी। यह भविष्य में विकसित होने वाली तमाम गाइडेड मिसाइलों का आधार भी थी। भारत में रॉकेट का इस्तेमाल सबसे पहले टीपू सुल्तान ने 18वीं शताब्दी में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई में किया था। टीपू से पहले उनके पिता हैदर अली ने रॉकेट प्रणाली को विकसित किया था। ये रॉकेट लगभग आधे हाथ लंबे होते थे और लगभग डेढ़ से दो किलोमीटर तक मार करने की क्षमता रखते थे। डा.एपीजे अब्दुल कलाम ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ नामक अपनी पुस्तत में नासा में एक चित्र का वर्णन करते हैं जिसमें टीपू सुल्तान की फ़ौज अंग्रेज़ों से लड़ रही है और उसमें रॉकेट उड़ते हुए दिखाए गए हैं। दरअसल, यह 1780 में पोल्लिलोर की लड़ाई का चित्र है जिसमें टीपू सुल्तान ने रॉकेट का इस्तेमाल कर अंग्रेज़ों को मात दी थी। ऐसा माना जाता है कि मैसूर रॉकेट प्रणाली की नक़ल करके ब्रिटिश इंजिनियर विलियम कोनग्रीव ने ‘कोनग्रीव रॉकेट’ प्रणाली विकसित की थी।

मोटे तौर पर देखा जाए तो दोनों अस्त्रों में फ़र्क यह है कि रॉकेट दिशाहीन होते हैं और इस वजह से उनमें अपने लक्ष्य से भटक जाने की संभावना ज्यादा रहती है। उधर, मिसाइल या प्रक्षेपास्त्र में दिशासूचक यंत्र फिट होता है जिसमें वह निश्चित दिशा में आगे बढ़ती है। इस वजह से उसके लक्ष्य को भेदने के ज़्यादा आसार होते हैं। इसको सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) कहते हैं। सीईपी वह सीमा है जिसके तहत दागी गई कुल मिसाइलों की आधी संख्या अपने लक्ष्य को भेदती हैं या उस सीमा में गिरती है। खाड़ी युद्ध में इराक की स्कड मिसाइलों का भारी खौफ़ था पर इनका सीईपी एक किलोमीटर था. यानी कि 50 फीसदी मिसाइलें ही लक्ष्य से एक किलोमीटर व्यास तक की दूरी तक भटक सकती थीं।

जर्मन वैज्ञानिक वेर्नर वॉन ब्राउन को मिसाइल प्रणाली का जनक कहा जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध में उन्होंने जर्मनी के लिए घातक वी-2 मिसाइलों का निर्माण किया था। युद्ध के ख़त्म होने के बाद एक गोपनीय ऑपरेशन के ज़रिये उन्हें और इनके 1600 वैज्ञानिक साथियों को अमेरिका लाया गया था। अमेरिका जाकर उन्होंने 3000 किलोमीटर तक की मारक क्षमता वाली इंटरमीडिएट बैलिस्टिक मिसाइल का निर्माण किया।

अब्दुल कलाम ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ में लिखते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध में जर्मनी द्वारा इस्तेमाल की गईं वी-2 मिसाइलें पारंपरिक आयुध ले जाने की क्षमता रखती थीं। इनका सीईपी 17 किलोमीटर था जो बेहद ख़राब कहा जा सकता है। पर इंग्लैंड पर दागी गयीं 500 वी-2 मिसाइलों ने लगभग 21,000 लोगों की जान ली और तकरीबन दो लाख घर तबाह कर दिए। कम ही लोगों को मालूम है कि वॉन ब्राउन 80 के दशक में भारत आए थे। यहां आकर उन्होंने देश को सेटेलाइट प्रोग्राम को नज़दीक से देखा था और भारतीय वैज्ञानिकों से अपना ज्ञान साझा किया था।

‘पृथ्वी’ का विकास कलाम ने उपग्रह प्रक्षेपण पर ज़बरदस्त काम किया था। इसी वजह से उन्हें भारत सरकार ने डिफ़ेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबॉरटरी (डीआरडीएल) भेजकर मिसाइल प्रणाली विकसित करने का अहम काम दिया। 90 के दशक की शुरुआत में पुरानी डेविल मिसाइल प्रणाली में आधारभूत परिवर्तन कर उसे कामचलाऊ बनाया गया। इसके सफल परीक्षण से इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईजीएमडीपी) को पंख लग गए। इसके बाद, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आनन-फ़ानन में इसके लिए 300 करोड़ रुपये का बजट भी आवंटित कर दिया। इंदिरा इसको लेकर इतनी उत्साहित थीं कि एक रोज़ वे डीआरडीएल के हैदराबाद स्थित दफ़्तर पंहुच गईं और कलाम का हाथ पकड़कर पूछा, ‘कलाम, मिसाइल का पहला परीक्षण कब होगा?’ उनका जवाब था, ‘जून 1987 में।’

इस वाकये को याद करके अब्दुल कलाम ‘टर्निंग पॉइंट्स’ में लिखते हैं कि इंदिरा उन्हें कमरे में टंगे नक़्शे की ओर इशारा करके बोलीं, ‘रंगों से हाइलाइट किए गए शहरों को देखो और ये बताओ कि वो कब दिन कब आएगा जब ये शहर हमारी मिसाइल की ज़द में होंगे।’ कलाम आगे लिखते हैं कि इंदिरा 3000 किलोमीटर दूर के शहरों की तरफ़ इशारा कर रहीं थीं। संकेत साफ था कि देश को इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल बनाने की दिशा में आगे बढ़ना है।

280 वैज्ञानिकों की टीम रात-दिन आईजीएमडीपी पर काम रही थी। सितंबर 1985 में श्रीहरिकोटा में पहला परीक्षण हुआ जो सफल रहा। इसके बाद, पायलट रहित एयरक्राफ्ट का भी सफल परीक्षण हुआ। जाधवपुर यूनिवर्सिटी में पृथ्वी मिसाइल के अल्गोरिदम विकसित किये गए। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस (भारतीय विज्ञान संस्थान) और इसरो जैसे संस्थान अहम प्रोजेक्ट के अलग-अलग हिस्सों पर काम रहे थे. कलाम इन सबके बीच की धुरी बने हुए थे क्यूंकि तब वे डीआरडीएल में बतौर निदेशक नियुक्त थे।

1988 के आते-आते पृथ्वी मिसाइल का काम अंतिम चरण में पंहुच गया। श्रीहरिकोटा से इसके लॉन्च की योजना बनाई गई। गुरुवार 25 फ़रवरी 1988 को सुबह 11.23 मिनट पर जब काउंटडाउन ख़त्म हुआ तो भयानक आवाज़ के साथ ‘पृथ्वी’ आकाश की ओर उड़ चली। भारतीय वैज्ञानिकों ने नयी इबारत लिख दी थी। टीपू का अधूरा छोड़ा गया काम अब अंजाम की ओर अग्रसर हो चला था। पृथ्वी के सफल परीक्षण के बाद दुनिया भर में हो-हल्ला मच गया. वेस्टर्न ब्लॉक (यानी नाटो राष्ट्र) पहले तो अवाक रह गया और फिर आंखें दिखाने लगा। परमाणु संपन्न सात देशों ने हिंदुस्तान को तकनीक के हस्तांतरण पर रोक लगा दी। इससे गाइडेड मिसाइल से जुड़े किसी भी उत्पाद को ख़रीदना लगभग नामुंकिन हो गया.

पर यह पहली और आख़िरी बार नहीं था। ‘इग्नाइटेड माइंडस’ में अब्दुल कलाम लिखते हैं कि इसी प्रकार के हालात 1970 के बाद भी हुए थे जब भारत सेटेलाइट प्रोग्राम के लिए विदेशों से उपकरण और तकनीक ले रहा था। इस काम में इस्तेमाल होने वाले बेरीलियम डायफ़्राम की ख़रीद के लिए न्यूयॉर्क की एक कंपनी से अनुबंध किया गया था। लेकिन क़रार होने के तीन महीने बाद उस कंपनी ने इसकी सप्लाई करने से मना कर दिया। इससे इस पूरे कार्यक्रम पर संकट आ गया।

कलाम आगे लिखते हैं कि एक रोज़ उन्हें पता चला कि भारत इसमें इस्तेमाल होने वाले बेरीलियम खनिज का सबसे बड़ा निर्यातक है और जापान उसका सबसे बड़ा खरीदार। उन्हें यह भी मालूम हुआ कि जापान इस खनिज से डायफ़्राम बनाकर न्यूयॉर्क की उस कंपनी को बेचता है जिससे भारत को यह उपकरण ख़रीदना था। मामले की तह तक पहुंचते ही खनिज का निर्यात बंद किया गया और देश में उस उपकरण को बनाने की तकनीक पर काम शुरू कर हमेशा के लिए इस मुश्किल से छुटकारा पा लिया गया। जब-जब भी प्रतिबंध लगे, भारत मज़बूत ही हुआ और आत्मनिर्भर भी।

पृथ्वी के सफल परीक्षण के बाद भारतीय सेना ने कलाम की टीम से इसका सीईपी मापने की बात कही। इसके लिए इसे ऐसी जगह पर टेस्ट करना था जहां आबादी न हो। भारत के पश्चिम में रेगिस्तान मुफ़ीद था पर पकिस्तान के नज़दीक होने की वजह से देश के व्हीलर टापुओं को चुना गया। ये ओड़िशा के तटीय इलाके थे। जब कलाम और टीम इस जगह का निरीक्षण करने पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां बांग्लादेश के झंडे लगे हुए हैं। उन्होंने तुरंत वे झंडे उतारे और स्थानीय प्रशासन को इसकी ख़बर देकर होशियार किया। ‘पृथ्वी’ का सर्कुलर एरर प्रोबेबल (सीईपी) महज़ 50 मीटर ही है! कलाम के सम्मान में इन टापुओं को अब अब्दुल कलाम द्वीप कहा जाता है। पर टीपू सुल्तान के नाम पर किसी भी मिसाइल का नामकरण अब तक नहीं हो सका है।

आईजीएमडीपी के तहत पृथ्वी के अब तीन चरण हैं। इसके अलावा आकाश, नाग, त्रिशूल, ब्रह्मोस मिसाइलें विकसित की जा चुकी हैं। जहां पृथ्वी मिसाइल ज़मीन से ज़मीन पर मार करती है वहीं अन्य मिसाइलें ज़मीन से हवा, पानी से हवा आदि में मार करने के लिहाज से विकसित की गई हैं। इस दौरान कई विफलताओं से सामना भी हुआ है। लेकिन स्पेस और प्रक्षेपास्त्रों की तकनीक पर काम करने वाले वैज्ञानिकों से बेहतर यह बात भला कौन जानता होगा कि ऊपर बढ़ने की सीढ़ी में कुछ पाए विफलताओं के भी होते हैं। (इनपुट साभार)