नेहरू-गांधी खानदान के राजनीति में सक्रियता के 100 साल, और प्रियंका की एंट्री

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कानक्लेव में दिल खोलकर बातें की प्रियंका पर

राजनीति व बच्चों की पढ़ाई लिखाई पर भी बोले

भुवनेश्वर (महेश शर्मा)। बुद्धिजीवियों की एक कान्क्लेव में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी को परोक्ष रूप से कांग्रेस का स्टार प्रचारक कह ही दिया। प्रियंका की राजनीति पर सवाल एक था पर लगा जैसे राहुल को उनका प्रिय विषय मिल गया। सो बोलते गए। एक सवाल के जवाब में राहुल बोले, प्रियंका जहां चाहे वहां प्रचार के लिए जा सकती है। उनके कार्यक्रम उनसे पूछकर लगाए जाएंगे।

नेहरू-गांधी खानदान का राजनीति में सक्रियता का यह 100वां साल है। बताते हैं कि मोतीलाल नेहरू के सक्रिय राजनीति में आने के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। प्रियंका की एंट्री भी परिवार की राजनीतिक सक्रियता के 100वें वर्ष पर हुई। इसे शुभ माना जा रहा है। राहुल ओडिशा के अखबार समाज की कानक्लेव में प्रियंका पर खुलकर बोले कि कैसे वह आईं। उनकी फैमिली बच्चों की क्या स्थिति है। और तो और प्रियंका के बच्चों की पढ़ाई लिखाई पर भी चर्चा करने से नहीं चूके। लगा जैसे वह परिवार के बीच हों। यह बात दोहरा भी देते थे। कुछ भी पूछिए हम परिवार में हैं।

गठबंधन की राजनीति में फिट न बैठ पाने के कारण राहुल गांधी थोड़ा निराश बताए जा रहे थे। शायद वह जनता की नब्ज नहीं भांप सके थे। बीजेपी का यह कहना किसी हद तक सही भी है कि राहुल के बचाव के लिए प्रियंका गांधी के रूप में कांग्रेस ने ट्रंप कार्ड चला है। खुद राहुल कहते हैं कि उनकी प्रियंका संग मुद्दों को लेकर खूब बातचीत होती रही। वह यह भी कहते हैं कि हम दोनों भाई बहिन समान विचारधारा वाले होने के कारण और भी एक दूसरे के करीब हैं।

राहुल गांधी ने यूपी फतह की जिम्मेदारी प्रियंका को बहुत सोच समझकर दी है। यहां से 80 सीटें हैं। कांग्रेस सिर्फ दो पर है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में 2009 के चुनाव में कांग्रेस के पास 13 सीटें थी। यहां पर सपा-बसपा का बोलबाला है। लोगों का कहना है कि कांग्रेस का दलित और मुस्लिम वोट लौट रहा है। ऐसे में यदि कांग्रेस बेहतर करती है तो नुकसान सपा-बसपा गठबंधन का होता है। दोनों दलों के प्रति राहुल बहुत नरम हैं। तो क्या फ्रैंडली फाइट होगी। यानी सिर्फ कांग्रेस तमाम सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए कंडीडेट उतारेगी। जीतने के लिए नहीं। चर्चा अभी से शुरू हो गयी है कि कांग्रेस की प्राथमिकता कौन है, राहुल या प्रियंका। देखने में लगता है कि राहुल बहुत परिपक्व हो चुके हैं। बीते चुनाव में 44 के अंक पर सिमटी कांग्रेस कोई करतब दिखा सकती है। वजह बताई जाती है प्रियंका।

एक रिपोर्ट के अनुसार प्रियंका की ख़ासियत है कि वो लोगों से जल्दी जुड़ जाती हैं। रायबरेली में प्रियंका गांधी कभी भी अचानक ही बीच सड़क पर रुककर किसी भी कार्यकर्ता को नाम से पुकार लेती हैं। उसका हाल चाल लेती थी। इतना ही नहीं अगर वहां पर किसी का काम किसी नेता की वजह से रुकता था, तो नेता प्रियंका गांधी के ग़ुस्से से बच नहीं पाते थ।.प्रियंका गांधी ने अपना पहला सार्वजनिक भाषण 16 साल की उम्र में दिया था।

प्रियंका के आने के बाद लोग उनकी तुलना राहुल से करने लगे। हालांकि भुवनेश्वर में राहुल गांधी ने बहुत ही मिलनसार व्यक्तित्व का होने का परिचय दिया। घुले मिले रहे। पहले वह  लोगों का सामना करने से हिचकते थे। प्रियंका अच्छी वक्ता भी हैं. वो लोगों के हिसाब से भाषण देती हैं। हालांकि वो बड़ी रैलियों के बजाय छोटी-छोटी भीड़ में लोगों से जुड़ना ज़्यादा पसंद करती हैं। यही कांग्रेस के लिए प्लस प्वाइंट बताया जाता है। गुजरात के बाद, कर्नाटक और फिर मध्यप्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ में राहुल के नाम का डंका बजा दिया है. लेकिन बावजूद इसके उन्हें बाकी विपक्षी पार्टियां नेता के रूप में स्वीकार नहीं कर रही। बताते हैं कि प्रियंका का बाकी दलों से अच्छा रिश्ता है। उनकी पहचान और स्वीकृति कांग्रेस को माइलेज दे सकती है। हां, राबर्ट वाड्रा पर लगे आरोप उन्हें थोड़ा परेशान कर सकते हैं।