त्वरित टिप्पणीः..तो कम हो गयी आधार की धार !

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महेश शर्मा

सुप्रीमकोर्ट का बड़ा फैसला बुधवार को आया है। कोर्ट ने आधार की धार कम कर दी है। अब मोबाइल सिम, बैंक खाता के लिए आधार जरूरी नहीं होगा। यही नहीं स्कूल में प्रवेश, सीबीएसई, नीट और यूजीसी की परीक्षाओं के लिए आपको आधार कार्ड दिखाना जरूरी नहीं होगा। लेकिन पैन कार्ड बनाने, आयकर रिटर्न, सरकारी योजना और सब्सिडी के लिए आधार नंबर जरूरी हो गया है। इस जजमेंट के बाद आधार के उपयोग को लेकर सार्वजनिक बहस छिड़ चुकी है। हो सकता है कि कोई याचिका कर्ता इसे सात सदस्यीय खंडपीठ में सुनवायी की मांग करते हुए याचिका दायर कर दे।

आपको बताते चलें कि आधार कार्ड पर 27 रिट पिटीशन पर 38 दिनों तक सुनवायी चली थी। इसमें एक याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस केएस पुटुस्वामी भी थे। याचिका में आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। कहा जा रहा था कि आधार से निजता का उल्लंघन हो रहा है। 12 डिजिट का यह आई कार्ड सरकारी सेवाओं का लाभ उठाने के लिए सरकार ने अनिवार्य कर दिया था।

सुप्रीमकोर्ट की पांच जजों की खंडपीठ ने आधार को सुरक्षित और लोगों के लिए आवश्यक बताया है। इस पर सुनवायी 2018 के जनवरी माह से चल रही है। दस मई को फैसला आया था जिसे सुरक्षित रख लिया गया था। सरकार और याचिकाकर्ताओं के साथ ही देश की जनता की भी निगाहें इस जजमेंट पर थी। आधार की संवैधानिक वैधता पर फ़ैसला पढ़ते हुए जस्टिस सीकरी ने कहा कि आधार के लिए काफी कम जानकारी ली जाती है। ऐसे में लोगों की निजी जानकारी सुरक्षित है। आपको बताते चलें कि कुछ वर्षों में आधार की अनिवार्यता के विरुद्ध याचिकाएं सुप्रीमकोर्ट में दायर की गयी थी जिन पर सुनवायी जारी थी। वर्ष 2009 में यूपीए सरकार के कार्यकाल में योजना आयोग ने यूआईडीएआई का नोटिफिकेशन किया था।

नंदन नीलेकणि इसके चेयरमैन बने। वह इनफोसिस के आला अधिकारी थे। 2010 में महाराष्ट्र से इसे लांच किया गया था। दिसंबर 2010 में नेशनल आइडेंटिफिकेशन अथारिटी आफ इंडिया बिल लाया गया। 2011 में दस करोड़ लोगों ने आधार बनवाया। वर्तमान समय में इनकी संख्या 122 करोड़ है। देश की 135 करोड़ जनसंख्या मानें तो अभी भी 13 करोड़ लोग बाकी हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण कहते हैं कि यह आम आदमी को राहत देने वाला फैसला है। अब प्राइवेट कंपनियां आधार नहीं मांग सकती हैं। इस खंडपीठ में चीफ जस्टिस  दीपक मिश्रा, जस्टिस एके सीकरी, जस्टिस एएम खनविलकर, जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे।