तब गरम हुआ करता था नारों का बाजार

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चुनाव डेस्क। नारा देने वाले व लगाने वाले की नीयत में शक हो जाए तो झकझोर देने वाले नारे भी प्रासंगिकता खो देते हैं। यदि शक न हो यानी नीयत साफ हो तो यही नारे सत्ता पलट देते हैं। जुमलेबाजी के दौर में नये नारे फिर उभरने लगे हैं। कुछ पुराने नारे भी बरबस याद आ ही जाते हैं। प्रत्याशी सूची घोषित होने के साथ ही नारे भी बुलंद होने का दौर शुरू होने वाला है। बीजेपी ने ‘अच्छे दिन आने वाले हैं।’ अबकी बार मोदी सरकार, ‘अबकी बार फिर मोदी सरकार’ का नारा बुलंद किया तो कांग्रेस ‘चौकीदार चोर है’ के नारे पर चुनाव लड़ रही है।

हिंदी बेल्ट में खासकर नारों का खासा महत्व हुआ करता है। उत्तर प्रदेश तो नारा गढ़ने और इसी के बूते माहौल बनाने में अव्वल रहा है। जैसे समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो लोगों ने भरोसा जताया, ‘उम्मीद की साइकिल’ और सपा ने 224 सीटें जीतकर सरकार बना ली। बीते चुनाव में यूपी मे ही काम बोलता है। बीजेपी का नारा रहा ‘न गुंडाराज, न भ्रष्टाचार, अबकी बार भाजपा सरकार।‘

कांग्रेस ने गठबंधन से पहले नारा दिया था, ‘27 साल यूपी बेहाल।’ बसपा ने नारा दिया था बहन जी को आने दो। हालांकि कुछ साल पहले तक चुनावी चकल्लस का जरूरी हिस्सा रहने वाले नारे अब कम सुनाई पड़ते हैं। एक नजर डालिए कुछ ऐसे नारों पर जो हिलाकर रख देते थे। जैसे, ‘जमीन गयी चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में-द्वार खड़ी औरत चिल्लाए मरद गया नसबंदी में।‘ इमरजेंसी में यह नारा बहुत चर्चित रहा। ‘जली झोपड़ी भागे बैल, यह देखो दीपक का खेल।‘ 1960 के दशक में कांग्रेस, जनसंघ और सोशलिस्ट पार्टी का जोर था। कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी, जनसंघ का दीपक और सोशलिस्ट पार्टी का झोपड़ी चुनाव चिन्ह था।

1952 में कुछ कांग्रेसियों ने नारा दिया था, ‘खरो रुपयो चांदी को, राज महात्मा गांधी को।‘ 1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ नारा लगाया गया, ‘संजय की मम्मी बड़ी निकम्मी‘।‘बेटा कार बनाता है, मां बेकार बनाती है।‘ ‘नसबंदी के तीन दलाल, इंदिरा, संजय बंसीलाल‘ (1977 में इंदिरा के खिलाफ नारा)। सन 1978 में नारा लगाया गया था जब इंदिरा गांधी चिकमंगलूर से चुनाव लड़ी थी। नारा था, ‘एक शेरनी सौ लंगूर, चिकमंगलूर चिकमंगलूर।‘ यह नारा देवराज उर्स ने दिया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के डा.राम मनोहर लोहिया ने नारा दिया था, ‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावैं सौ में साठ।‘

कम्युनिस्टों ने नारा आजादी के बाद दिया था। ‘देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है।‘, ‘लाल किले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान।‘ सन 1960 में लेफ्ट ने एक नारा और दिया गया था। ‘धन और धरती बंट के रहेगी, भूखी जनता चुप न रहेगी।‘ इमरजेंसी मे एक नारा और चर्चित रहा। ‘आकाश से नेहरू रहे पुकार, मत कर बिटिया अत्याचार।‘ ‘खा गयी शक्कर पी गयी तेल, यह देखो इंदिरा का खेल।‘ कांग्रेस के श्रीकांत वर्मा का यह नारा चर्चित रहा। ‘जात पर न पांत पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर।‘ डा.राम मनोहर लोहिया का नारा, जिंदा कौमे पांच साल तक इंतजार नहीं करती।

देवकांत बरुआ ने नारा दिया था। इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा। जयप्रकाश नारायण का नारा था, इंदिरा हटाओ देश बचाओ। संपूर्ण क्रांति अब नारा है/भावी इतिहास तुम्हारा है। रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता जनजन की कविता थी। दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 1984में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद। जबतक सूरज चांद रहेगा/इंदिरा तेरा नाम रहेगा। फिर आम चुनाव में नारा गूंजा। ‘उठे करोड़ों हाथ हैं, राजीव जी के साथ हैं।‘

1989 में नारा गूंजा, ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।‘ कानपुर के सांसद रहे नरेश चंद्र चतुर्वेदी ने नारा दिया था। ‘राजा है न रंक है, देश का कलंक है।‘ मंदिर आंदोलन मे नारा चला। ‘सौगंध राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएंगे।‘ 1991 मे राजीव गांधी की हत्या केबाद नारा गूंजा। ‘राजीव तेरा यह बलिदान, याद करेगा हिंदुस्तान।‘ सन 1996 में यह नारा सुनायी पड़ा। ‘सबको देखा बारी बारी, अबकी बारी अटल बिहारी।‘ लालू प्रसाद यादव ने उच्च जातियों को अपमानित करने के लिए नारा दिया। ‘भूरा बाल साफ करो।‘ भूरा बाल यानी भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण व लाला (कायस्थ)।

‘रोटी कपड़ा और मकान मांग रहा है हिंदुस्तान।‘ महंगाई को रोक न पायी यह सरकार निकम्मी है, जो सरकार निकम्मी है वह सरकार बदलनी है।‘ सन 1980 में नारा गूंजा था, ‘आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा जी को लाएंगे।‘ अमेठी का डंका बेटी प्रियंका। 2010 में ममता बनर्जी ने नारा दिया। मां माटी मानुष। कांशीराम ने नारा दिया था, ‘ठाकुर बाभन बनिया चोर, बाकी सब हैं डीएस फोर।‘ सन 1993 में समाजवादियों ने नारा दिया था। ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जैश्रीराम।‘ बसपा का एक और नारा देखिये। ‘चलेगा हाथी उड़ेगी धूल, न रहेगा हाथ, न रहेगा फूल।‘ ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर।‘ फिर बिहार में नारा गूंजा, ‘ऊपर आसमान नीचे पासवान।‘ 2014 में नारा गूंजा। ‘अबकी बार मोदी सरकार।‘ बसपा के खिलाफ नारा चला। ‘गुंडे चढ़ गये हाथी पर, गोली मरिहै छाती पर।‘ ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा।‘ फिर बसपा का एक और नारा, ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है।‘

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