ट्रांसजेंडरों में खुशी की लहर दौड़ी जब पता चला विधेयक को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी

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भुवनेश्वर/नई दिल्ली 11 जुलाई। केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा बुधवार को ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक 2019 को मंजूरी दिए जाने के निर्णय से ओडिशा ट्रांसजेंडरों ने हर्ष व्यक्त किया। इसे ट्रांसजेंडरों को समाज की मुख्यधारा में जोड़ने वाला मोदी सरकार निर्णय बताया। मालूम हो कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों की सुरक्षा) विधेयक 2019 को प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी । इस विधेयक में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक सशक्तिकरण के लिए एक कार्य प्रणाली उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया है । विधेयक से हाशिए पर खड़े इस वर्ग के विरूद्ध लांछन, भेदभाव और दुर्व्यवहार कम होने और इन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने से अनेक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को लाभ पहुंचेगा। इससे समग्रता को बढ़ावा मिलेगा और ट्रांसजेंडर व्यक्ति समाज के उपयोगी सदस्य बन जायेंगे। ट्रांसजेंडर समुदाय को सामाजिक बहिष्कार से लेकर भेदभाव, शिक्षा सुविधाओं की कमी, बेरोजगारी, चिकित्सा सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से सशक्त बनाएगा।

ट्रांसजेंडरों के संगठन सखी की प्रांतीय अध्यक्ष एवं ओडिशा ट्रांसजेंडर्स एसोसिएशन की उपाध्यक्ष स्वीटी साहू का कहना है कि मोदी सरकार पर ट्रांसजेंडरो का विश्वास है। विधेयक का मकसद ट्रांसजेंडर को परिभाषित कर समुदाय के सशक्तिकरण और उनके अधिकारों की रक्षा करना है। लोकसभा ने दिसंबर 2018 में विधेयक को पारित किया था । सूत्रों ने बताया कि बिना किसी नए संशोधन के मसौदा विधेयक को फिर से अनुमोदन के लिए कैबिनेट में वापस ले लिया गया है। विधेयक शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र में ट्रांसजेंडर व्यक्ति के खिलाफ भेदभाव पर रोक लगाएगा । इसमें केंद्र और राज्य सरकारों को इन क्षेत्रों में कल्याण योजनाएं लाने का निर्देश होगा।

ट्रांसजेंडर समुदाय देश में एक ऐसा समुदाय है जो सार्वाधिक हाशिये पर है क्योंकि वे ‘पुरूष’ या ‘स्त्री’ के सामान्य वर्गों में फिट नहीं हैं।. यही वजह है कि इस वर्ग को सामाजिक बहिष्कार से लेकर भेदभाव, शैक्षणिक सुविधाओं की कमी, बेरोजगारी, चिकित्सा सुविधाओं की कमी और इसी प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय विविध सेवा प्राधिकरण बनाम भारत सरकार के मामले में 15 अप्रैल 2014 को उनके अधिकारों के सुरक्षा के लिए उन्हें तृतीय लिंग के रूप में मानने का निर्देश दिया है। ट्रांसजेंडर व्यक्ति को परिभाषित करने, उनके खिलाफ विभेद को प्रतिषेध करने, उन्हें स्वत: अनुभव की जाने वाली लिंग पहचान का अधिकार देने, उन्हें पहचान प्रमाणपत्र प्रदान करने के साथ नियोजन, भर्ती, पदोन्नति और अन्य संबंधित मुद्दे पर उनके साथ विभेद नहीं करने का प्रावधान किया गया है। शिकायत निवारण नेटवर्क स्थापित करने औकर नेशनल ट्रांसजेंडर काउंसिल स्थापित करने का प्रावधान है. विधेयक के उपबंधों का उल्लंघन करने पर दंड का भी प्रावधान किया गया है।

(एजेंसी से इनपुट)