संघर्ष, संकल्प और सृजन की संदेशवाहक उत्कलमणि गोपबंधु दास ज्योतियात्रा रवाना  

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कटक (महेश शर्मा)। उत्कलमणि पंडित गोपबंधु दास की आज की आज 142वीं जयंती है।  पूरा ओडिशा उत्कलमणि की जयंती धूमधाम से मना रहा है। इस अवसर  हमेशा की तरह  गोपबंधु ज्योतियात्रा निकाली गयी जिसका उद्देश्य जन-जन तक उनके संदेश का व्यापक प्रचार प्रसार और साथ ही नयी पीढ़ी को उनके व्यक्तित्व और कृत्रित्व से नये ओडिशा को परिचय कराना है।

यह ज्योतियात्रा गोपबंधु दास के गांव स्वांडो से निकाली गयी और अपरान्ह तीन बजे कटक स्थित समाज मुख्यालय पहुंची। तीसों जिलों में यात्रा का भव्य स्वागत उत्कलमणि के विचारों पर परिचर्चाएं रखी गयी हैं। ज्योतियात्रा का स्वागत करने वालों में लोक सेवक मंडल अध्यक्ष दीपक मालवीय ने बताया कि यह यात्रा संघर्ष, संकल्प और  सृजन की संदेश यात्रा है। उत्कलमणि पंडित गोपबंधुदास ज्योतियात्रा को देर शाम बाराबटी स्टेडियम के तेंदुलकर हॉल के निकट पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर दीपक मालवीय के निरंजन रथ, भीमसेन यादव, डा.प्रवास आचार्य, राजेंद्र कुमार जेना, मधुसूदन दास, बामापद त्रिपाठी, कार्यवाहक महाप्रबंधक प्रिचब्रत महंति समेत भारी संख्या में गणमान्य लोग उपस्थित थे।

जानिए गोपबंधु दास को

पुरी जिले के साक्षीगोपाल के स्वांडो गांव में आज ही के दिन 9 अक्टूबर 1877 को ब्राह्मण परिवार में जन्मे गोपबंधु दास प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, कवि तथा साहित्यकार थे। इनके पिता का नाम दैतारि दास तथा माता का नाम स्वर्णमायी देवी था। उन्होंने पुरी, कटक  तथा कोलकाता में शिक्षा ग्रहण की। वर्ष 1906 में एलएलबी की डिग्री हासिल की। ओडिशा राज्य में स्वाधीनता आंदोलन, प्राकृतिक आपदाओं में सेवा कार्यों की बात आती है तो सबसे पहले गोपबंधु जी का नाम लिया जाता है। किसी भी राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय हस्ती का ओडिशा में भाषण उत्कलमणि का नाम लिए बगैर शुरू नहीं होता।  ओडिशा के लोग इन्हें दरिद्र के सखा के रूप में भी जानते हैं।  विभिन्न अंचलों को संगठित करके ओडिशा राज्य निर्माण में भी उनका योगदान रहा है।

गांधी जी (कुर्सी पर), आगे बैठे गोपबंधु दास

उत्कल सममिलन संस्था बनायी

शिक्षा पूरी करने के बाद गोपबंधु दास आजीविका के लिए वकालत करने लगे। वे जीवन पर्यंत शिक्षा, समाज सेवा और राष्ट्रीय कार्यों में संलग्न रहे। राष्ट्रीय भावना इनके अन्दर बाल्यकाल से ही विद्यमान थी। गोपबंधु दास विद्यार्थी जीवन से ही ‘उत्कल सममिलनी’ संस्था में शामिल हो गये थे। इस संस्था का एक उद्देश्य सभी उड़िया भाषियों को एक राज्य के रूप में संगठित करना भी था। उन्होंने इसे स्वतंत्रता संग्राम की अग्रवाहिनी बनाया। जब महात्मा गांधी ने असहोयग आंदोलन शुरू किया तब गोपबंधु दास ने अपनी संस्था उत्कल सममिलनी का कांग्रेस में विलय कर दिया।

ओडिशा में असहयोग आंदोलन चलाया

उत्कलमणि गोपबंधु दास को ओडिशा में चेतना का अग्रदूत कहा जाता है। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अनेक बार जेल की यात्राएँ कीं। वर्ष 1920 में  नागपुर कांग्रेस में उनके प्रस्ताव पर ही कांग्रेस ने भाषावार प्रांत बनाने की नीति को स्वीकार किया था। उड़ीसा राष्ट्रवाद के वे श्रेष्ठ पादरी बन गए थे तथा 1921 में उन्होंने उड़ीसा में ‘असहयोग आंदोलन’ की अगुवाई की। उन्हें दो वर्ष की कैद हुई। गोपबंधु दास लाला लाजपतराय की लोक सेवक मंडल नामक संस्था के भी सदस्य बने। उन्होंने अपनी मृत्यु से पूर्व एक वसीयत के जरिये ओडिय़ा अखबार समाज का संचालन लोक सेवक मंडल के हाथों में सौंप दिया था। वर्ष 1909 में गोपबंधु दास ने साक्षी गोपाल में एक हाईस्कूल की स्थापना की। बंगाल में शांति निकेतन की तरह उड़ीसा के सत्यवादी नामक स्थान में खुले आकाश के नीचे एक वनविद्यालय खोला था और वहाँ बकुलवन में छात्रों को स्वाधीन ढंग से शिक्षा दिया करते थे। उन्हीं की प्रेरणा से उड़ीसा के विशिष्ट जननेता और कवि स्वर्गीय गोदावरीश मिश्र और उत्कल विधानसभा के वाचस्पति (प्रमुख) पंडित नीलंकठ दास ने इस वनविद्यालय में शिक्षक रूप से कार्य किया था।

शांति निकेतन की तर्ज वन विद्यालय खोला

यह विद्यालय शांति निकेतन की भांति खुले वातावरण में शिक्षा देने का एक नया प्रयोग था। साहित्य लेखन में भी उनकी काफी रुचि थी। उन्होंने कुछ कविताएं और गद्य लेखन भी किया। जैसे बन्दीर आत्मकथा यानी एक कैदी की आत्मकथा, अवकाश चिंता यानी लेजर टाइम थाट्स, कारा कविता यानी जेल में लिखी कविताएं, नचिकेता का उपाख्यान यानी नचिकेता की कहानी, धर्मपद, गो महात्मय लिखा। उनके दौर में  साहित्य सृजन काल को सत्यवादी युग कहा  जाता है। बताते हैं कि पंडित गोपबंधु दास जी ने सत्यादी नाम से पत्रिका का प्रकाशन भी शुरू किया था। यह पत्रिका आज भी समाज के मुद्रक एवं प्रकाशक निरंजन रथ के संपादकत्व में निकल रही है।