कर्नाटकः मौका मिला तो भाजपा चल सकती है ये दांव

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महेश शर्मा

कांग्रेस का बिना शर्त समर्थन पाकर जनता दल (स) के नेता एचडी कुमारस्वामी ने राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश किया। उनका कहना है कि उनका गठबंधन बहुमत में हैं। उधर भाजपा का दावा है कि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का अवसर उसे मिलना चाहिए। विधानसभा में वक्त आने पर वह बहुमत साबित कर देंगे। पर कैसे?

भाजपा 104, कांग्रेस 78 और जनता (स) 38 तथा अन्य के पास 2 सीटें हैं। आंकड़े बिलकुल साफ हैं। निर्दलीय दो विधायकों को कांग्रेस पहले ही मदद कर रही थी। उसके बाद भी दोनों भाजपा में चले भी जाएं तो भी मैजिक फिगर के आसपास भाजपा नहीं फटकती। यानी उसे छह विधायकों की जरूरत पड़ेगी। तो क्या हार्स ट्रेडिंग संभव है? भाजपा को मौका मिला तो विधायकों के हृदय परिवर्तन होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। एंटी डिफेक्शन कानून के दायरे में रहते हुए, भाजपा के रणनीतिकार खेल बना सकते हैं।  नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा शायद भूल गयी है कि कुछ राज्यों में सबसे बड़ी पार्टी न होने के बाद भी उसके नेताओं ने तियापांचा करके सरकार बना ली थी।

मसलन गोवा की तस्वीर देखो। दूसरे नंबर पर होने के बाद भी सरकार बना ली थी। अकेली बड़ी पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस को बुलाया तक नहीं गया था। कर्नाटक में यही क्या कम है कि बुला लिया गया। गोवा में भाजपा ने एमजीपी और गोवा फारवर्ड पार्टी के साथ जुगलबंदी करके सरकार बना ली थी। कांग्रेस को 18 सीट थी। वह बहुमत से 3 सीट दूर थी। भाजपा के पास 13 सीटें थीं, बहुमत से 8 सीट की दूरी थी। अब आइए मेघालय और मणिपुर में। सो यहां भी यही हुआ था। मणिपुर में कांग्रेस ने 28 सीटें हासिल की थी। सबसे बड़ी पार्टी बनकर थी।  भाजपा को 21 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। इसके बाद भी मणिपुर में भाजपा की सरकार बनी।

तियापांचा करके समर्थन जुटा लिया। आइए मेघालय में। यहां भी बड़ी पार्टी होने के बाद भी कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। भाजपा ने दो सीट हासिल करके नेशनल पीपुल्स पार्टी की सरकार बनाने में योगदान दिया। बिहार में जद (यू) की सरकार बनवा दी। राजद बड़ा दल था पर बाहर हो गया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि भाजपा यदि अपने पर उतर आयी तो कर्नाटक में उसी की सरकार बनेगी। कैसे यह तो रणनीतिकार ही बता पाएंगे, वो भी भाजपा के। यहां पर सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा क्या मानक स्थापित करती है यह तो समय ही बता सकेगा। फिलहाल तो भाजपा संख्या बल जुटाने में लगी है। तेल देखो और तेल की धार देखो।

बहुमत के जुगाड़ के जुगत में जुटी भाजपा को यदि मौका मिलता है तो वह कर्नाटक का पुराना इतिहास दोहरा सकती है। कांग्रेस या जद (स) के कम से आठ या उससे ज्यादा विधायकों को तोड़कर उन्हें मंत्री बना दें और दलबदल विरोधी कानून के दायरे में आने पर सदस्यता समाप्त करके भाजपा की ही टिकट पर चुनाव लड़ाकर जितवाकर फिर ताजपोशी कर दे। इस खेल में प्रत्याशी जीत भी सकते हैं। यह नियम है कि बिना किसी सदन का सदस्य रहे छह माह तक किसी को भी मंत्री बनाए रखा जा सकता है। यही एक शतरंजी चाल दिखती है जो बहुमत साबित करने का मौका दिए जाने पर भाजपा चल सकती है।

 

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