ओडिशा में रज पर्व 14 जून से

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भुवनेश्वर। ओडिशा एक ऐसा राज्य है जहां मासिक धर्म (पीरियड्स) का जश्न मनाया जाता है। यह पर्व 14 जून (गुरुवार) से शुरू होता है। इसे रजो पर्व कहा जाता है। रजपर्व ओडिशा के तटीय क्षेत्र में मनाया जाता है। चार दिन तक घर और बाहर के सारे कामकाज ठप।

जून माह में हर साल चार दिन तक मनाए जाने वाले रज पर्व की परंपरा के पीछे मान्यता की बाबत बताया गया कि राज्य के लोग मानते हैं कि भूदेवी (पृथ्वी) भगवान विष्णु की पत्नी हैं। बारिस आने वाली होती है तो भूदेवी को रजस्वला से होकर गुजरना पड़ता है। उनका यह पीरियड तीन से चार दिन तक का होता है।

इस दौरान खेतीबारी, बुआई कटाई यानी जमीन से जुड़े सारे काम रोक दिए जाते हैं ताकि भूदेवी को खुश रखते हुए आराम दिया जा सके। पर्व का पहला दिन रज होता है, दूसरा वाला दिन मिथुन संक्रांति तथा तीसरा दिन जिस दिन माना जाता है कि पीरियड्स खत्म होते हैं, उसे बासी-रज कहा जाता है। ओडिशा में तीनों दिन बालिकाएं और युवतियां नये कपड़े पहनती हैं। सजती हैं, मेहंदी लगाती हैं। झूला झूलना आदि सब काम करती हैं। विवाहित महिलाएं तीन व कहीं कहीं चार दिनों तक कोई काम नहीं करती हैं। घर का सारा काम पुरुष करते हैं। चाहे वह खाना बनाना ही क्यो न हो।

अधिकतर घरों में पकवान रजपर्व शुरू होने से पहले ही बना लिए जाते हैं। गांवों में देसी खेलकूद का माहौल रहता है। पेड़ों पर झूले लग जाते हैं। मुख्य डिश पीठा घर-घर बनाया जाता है। पान खाना एक परंपरा है। पुरी, कटक, जगतसिंहपुर, भद्रक, केंद्रपाड़ा, बालासोर, गंजाम जिलों का यह प्रमुख त्योहार है। सोजा-बोजा (सजावट, गीत संगीत) से शुरू हुए रजोपर्व का समापन वासुमति स्नान (गाधुआ) अर्थात भूदेवी स्नान के साथ होता है। पीठा, चाकुली पीठा मुख्य खाना होता है।

भारत में धरती को हमेशा स्त्री का दर्जा दिया गया है। जिस तरह सामान्य तौर पर स्त्री के रजस्वला होने के बाद अनुमान लगा लिया जाता है कि वह संतानोत्पत्ति में सक्षम है ठीक उसी तरह अषाढ़ मास के भूदेवी के रजस्वला होती हैं और खेतों में बीजा डाला जाता है ताकि फसल पैदावार अच्छी हो। रजोत्सव के पांचवे दिन स्त्रियां बाल धोकर शुभ कार्यों में भाग लेने लगती हैं।

सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय लेखिका मंजू शर्मा के एक लेख के अनुसार ओडिशा में धरती (‘भूदेवी ) भी तीन दिनों के लिए रज:स्वला होती है और इन तीन दिनों के दौरान इस राज्य में कृषि-संबंधित सभी कामकाज को पूर्णत: निषिद्ध कर दिया जाता है। यहाँ की पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार देव ‘विष्णु(जगन्नाथ)’ की पत्नी ‘भूदेवी’ आषाढ के महीने में तीन दिनों के लिए जब रज:स्वला होती है , उस दौरान ही यह त्योहार ‘रज’, ओडिया भाषा में जिसे ‘रजो’ उच्चारित किया जाता है,बहुत-ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।


‘रज’ शब्द ही ‘रजस्वला’ अर्थात् मासिक-धर्म से लिया गया है,इस दौरान विशेषकर ओडिशा के तटीय क्षेत्रों , पुरी ,कटक,बालासोर और ब्रह्मपुर आदि में  ‘रजपर्व’ मनाया जाता है। विशेष बात यह है कि आषाढ़ में यह त्योहार ‘रजो’ लड़कियों और महिलाओं के बीच  विशेष उल्लास-से मनाया जाता है।  एक अच्छी बात इस दौरान स्थानीय लोगों के बीच दिखाई देती है कि  तीन दिवसीय ‘रजो’ के दौरान घर की स्त्रियों और लड़कियों को घरेलू कामकाज-से पूरी तरह-से स्वतंत्र कर दिया जाता है। कुँवारी लड़कियाँ पैरों में आलता डालकर , नए कपड़े और नए आभूषणों से सज-धजकर घरों-से बाहर निकलती हैं और पेड़ों की मज़बूत डालियों-से झूले बाँधकर खूब झूला झूलती हैं,लूडो खेलती हैं या ताश खेलती हैं। अर्थात् स्थानीय लोगों के लिए सभी तरह की मस्ती का नाम है यह ‘रजोपर्व’। स्त्रियों को लगता है कि चलो इस त्योहार के बहाने ही तीन दिनों के लिए, हर दिन के घर के कामकाज से आज़ादी तो  मिली  , क्योंकि इस दौरान घर को संभालने की जिम्मेदारी  घर के पुरूषों पर होती है,भले ही रसोई हो या साफ़-सफ़ाई,सबकुछ पुरूष ही संभालते हैं। इस ‘रजपर्व’ के दौरान धरती पर नंगे पैर चलने से सख्त मनाही होती है,  क्योंकि भूदेवी इस समय मासिकधर्म की पीड़ा झेल रही होती हैं। कुल मिलाकर पूरे पाँच दिनों तक ‘रजो’ की धूम रहती है,’रजो’ के आरंभ होने के पहले ‘सोजा-बोजा’(साज-बाज) होता है , अर्थात् जिसमें तैयारी के लिए सजावट का  खासा ध्यान रखा जाता है।

पहले दिन को ‘पहिली रजो’ के नाम से जाना जाता है,  जिसमें यह माना जाता है कि यह धरा के मासिक धर्म का पहला दिन है,इस दौरान कुँवारी लड़कियों को  अपने नंगे पाँव धरती पर नहीं रखना होता है। इस ‘पहिली रजो’ के बाद दूसरा  दिन,  ‘भूदेवी’ के रज:स्वला का दूसरा दिन , मिथुन संक्राति/रजो संक्रांति (वास्तविक रजो) कहलाता है। और अंत में तीसरे दिन मनाया जाता है,शेष रजो/भू दहा/बासी रजो। लगभग सोजा-बोजा से ही चल रहे इस त्योहार का अंत होता है.  वासुमति गाधुआ अर्थात् धरा/भूदेवी का स्नान। इस समय घरों में पहले से ही तैयारी के दौरान तरह- तरह के (पीठा ) पकवान तैयार किए जाते हैं,जिनमें प्रमुखता से शामिल होता है,पोडापीठा और चाकुली पीठा,जो चावल के पाउडर और इन तटीय क्षेत्रों में बाहुल्यता से उपलब्ध नारियल से बनाया जाता है।  इस दौरान  डोली ( अमूमन हम जिसे चरखे के रूप में जानते हैं)  में बैठकर खेला जाता  है .  ‘रजो उत्सव’  के दौरान ही ‘राम डोली’,’चरखी डोली’,पता डोली और ‘डंडी डोली’ का भी लोग मज़ा लूटते हैं,  इसपर बैठकर घूमते हैं और तब रजो’ के विभिन्न प्रचलित लोकगीत भी महिलाएँ और छोटी-छोटी बच्चियाँ गाती  हैं।


धरती  प्रकृति की ओर से स्त्री जाति का ही प्रतिनिधित्व करती है और शायद यही वज़ह है कि ‘भूदेवी’ के भी आषाढ़ माह में रजस्वला होने की मान्यता बनी है । भूदेवी’ के रज:स्वला होने के पश्चात् मानसून की बारिश होते ही  धरती में फसल/बीज बोए जाते हैं।  हिंदू धर्म की पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो भी महिला रजस्वला होती है,  उसके  पाँचवे दिन बालों को धोकर नहाने के पश्चात् ही पूरी तरह से सभी घरेलू कामों और पूजापाठ के लिए उसे शुद्ध,पवित्र और योग्य माना जाता  है और रसोईघर के सभी कामों के लिए उसे पुन: मान्यता मिल जाती है। ठीक उसी तरह-से इस ‘रजपर्व’ को आषाढ़ माह में मनाए जाने के पीछे भी यह तथ्य साफ़ नज़र आता है कि आषाढ़ के महीने में बारिश होती है और इसी मानसून के बारिश के पश्चात् रज:स्वला स्त्रियों की तरह अच्छे-से ‘धरा/भूदेवी’ की भी शुद्धिकरण की प्रक्रिया हो जाती है,साथ ही इसी महीने-से हलों को भी धरती में उतारकर  कृषि की प्रक्रिया का आरंभ भी हो जाता है। .

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