ओडिशा की मांगः उत्कलणि गोपबंधु दास को भारत रत्न से नवाजें

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कटक 9 अक्टूबर। उत्कलमणि पंडित गोपबंधु दास के 141वें जन्म दिवस पर उन्हें भारत रत्न से नवाजने की मांग ओडिशा से उठायी गई है। वह समाज समाचार पत्र के संस्थापक हैं जो 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। राज्यसभा में बीजू जनता दल के सदस्य डा.अच्युत सामंत ने कीट युनिवर्सिटी में उनके नाम पर चेयर स्थापित करने के दौरान कहा था कि गोपबंधु दास का योगदान पूरे राष्ट्र के लिए एक उदाहरण है। देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से उन्हें नवाजा जाना चाहिए। लोक सेवक मंडल के अध्यक्ष दीपक मालवीय ने भी यह मांग उठायी थी कि गोपबंधु जी सिर्फ ओडिशा के ही नहीं हैं। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। केंद्रीयमंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस अवसर पर मीडिया से कहा कि उन्हें बेहद खुशी होगी यदि उत्कलमणि गोपबंधु दास को भारत दिया जाता है।

 

पुरी में मूर्ति उनके प्रति श्रद्धा व आस्था का प्रतीक

गोपबंधु दास को भारत रत्न से नवाजने की मांग पुरजोर ढंग से उठने लगी है। यह भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान होता है। पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण और फिर भारत रत्न देश के नागरिक सम्मान हैं। गोपबंधु दास (1877-1928) ओडिशा के एक सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, पत्रकार एवं साहित्यकार थे। उन्हें उत्कल मणि के नाम से जाना जाता है। आज भी संबोधन में ओडिशा का नाम लेने से पहले वक्तागण गोपबंधु दास का नाम लेते हैं। यही नहीं राष्ट्रीयता एवं स्वाधीनता संग्राम की बात तो उनका नाम लिए बिना शुरू ही नहीं होती। राज्य के लोग गरीबों और मजलूमों की रहनुमाई उन्हें दरिद्र के सखा के रूप में स्मरण करते हैं। ओडिशा की धार्मिक राजधानी पुरी जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार के उत्तरी पार्श्व में चौक के सामने उनकी संगमरमर की मूर्ति स्थापित है। श्रीमंदिर परिसर के निकट गोपबंधु जी की प्रतिमा का होना उनके प्रति श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है। बाढ़ और तूफान के दौरान दीनदुखियों की मदद सदैव उनकी प्राथमिकता रही है। उत्कलमणि ने विभिन्न अंचलों को संगठित करके ओडिशा (उड़ीसा) निर्माण में महती भूमिका निभायी है।

सेवा क्षेत्र सदैव प्राथमिकता रहा

9 अक्टूबर 1877 को पुरी के स्वांदो गांव में जन्में उत्कलमणि गोपबंधु ने अपने परिवार की कीमत पर भी गरीबों की सेवा की। उन्होंने विवाहोपरांत भी शिक्षा जारी रखी। उन्हें स्कूली दिनों में शिक्षक भी प्रतिभाशाली और राष्ट्रवादी सोच के मिलते रहे। राष्ट्रवादी सोच उनके मन में घर कर गये। हैजा की महामारी के दौरान अधिकारियों की अपर्याप्त प्रतिक्रिया ने उन्हें एक स्वैच्छिक कोर पुरी सेवा समिति शुरू करने को प्रेरित किया। बाद सेवा आंदोलन ने हैजा मरीजों के लिए अलग अस्पताल की स्थापना की। एक छात्र के रूप में गोपबंधु जी साहित्यिक उत्साह से उत्कृष्ट थे। साहित्यिक अभिरुचि ने उनके दृष्टिकोण अत्याधिक मानवीय और राज्य को देश में प्रतिष्ठित करने में सहायक हुआ। उनकी कविताएं मर्मस्पर्शी होती थी। आज भी लोग गुनगुनाते हैं।

उत्कल सम्मेलन के साथ ही बढ़े राजनीतिक संपर्क

वर्ष 1903 में उत्कलमणि गोपबंधु के उत्कल सम्मेलन के साथ ही उनके राजनीतिक की संपर्क शुरुआत हुई, लेकिन उन्होंने दूसरों को राजी कर दिया कि वह राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय आंदोलन को राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बनाया। शायद इसीलिए वह ओडिशा में कांग्रेस के संस्थापक अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा। सत्ता की खोज में नेताओं के आपसी झगड़ों से वह दुखी थे। लोगों की सेवा के क्षेत्र में फिर वापसी की। वह मृत्यु तक लोकसेवक मंडल के उपाध्यक्ष रहे। गोपबंधु जी 1917 से लेकर 1920 तक चार साल के लिए ओल्ड बिहार और ओडिशा विधान परिषद के सदस्य भी रहे। इसी के साथ उन्होंने चार प्रमुख समस्याओं पर बल दिया अर्थात सभी ओडिया बोलने वाले इलाकों का एकीकरण, बाढ़ की रोकथाम के लिए स्थायी उपाय, अकाल उत्पाद शुल्क से मुक्त नमिया निर्माण के लिए ओडिया के अधिकार की बहाली और सत्यवादी मॉडल पर शिक्षा का प्रसार। इस कार्य के लिए वह नियमित उपस्थित रहते थे और उत्कल सम्मेलन की बैठक में भाग लेते थे। उन्होंने ओडिया की व्यापक परिभाषा दी। इसमें ओडिशा को कोई भी शुभ चिंतक ओडिया ही है। चक्रधरपुर सत्र में उत्कल सम्मेलन के हिस्से के रूप में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उद्देश्यों और वस्तुओं को स्वीकार करने के उनके प्रस्ताव को मंजूरी दी गयी।

 

भाषावार प्रांत बनाने का प्रस्ताव उनका ही था

शिक्षा पूरी करने के बाद गोपबंधु दास आजीविका के लिए वकालत करने लगे। वे जीवन पर्यंत शिक्षा और समाज सेवा और राष्ट्रीय कार्यों में संलग्न रहे। राष्ट्रीय भावना तो गोपबंधु जी के हृदय में बचपन से ही विद्यमान रही। वह विद्यार्थी जीवन से ही उत्कल सम्मिलनी संस्था में शामिल हो गए थे। इस संस्था का एक उद्देश्य सभी ओडिया भाषियों को एक राज्य के रूप में संगठित करना भी था। पंडित गोपबंधु दास ने इसे स्वतंत्रता संग्राम की अग्रवाहिनी बनाया। जब महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन शुरू किया तब गोपबंधु दास ने अपनी संस्था का कांग्रेस में विलय कर दिया। वह ओडिशा में राष्ट्रीय चेतना के अग्रदूत थे। स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अनेक बार जेल की सजा काटी। 1920 की नागपुर कांग्रेस में उनके प्रस्ताव पर ही कांग्रेस ने भाषावार प्रांत बनाने की नीति को स्वीकार किया था। ओडिशा राष्ट्रवाद के गोपबंधु जी श्रेष्ठतम व्यक्ति बन चुके थे। गोपबंधु दास लाला लाजपत राय द्वारा लोक सेवक मंडल (सर्वेंट्स ऑफ दि पीपुल सोसाइटी के सदस्य भी बने बाद में पदाधिकारी। सन 1909 में पंडित गोपबंधु दास ने साक्षी गोपाल में एक हाई स्कूल की स्थापना की। यह विद्यालय शांतिनिकेतन की भांति खुले वातावरण में शिक्षा देने का एक नया प्रयोग था। ओडिशा की नवीन पटनायक सरकार इसे विश्व विद्यालय का रूप देने का निर्णय इसी वर्ष (2018) ले चुकी है।

साहित्य में सत्यवादी युग उन्हीं की देन

लोकसेवक मंडल के अध्यक्ष एवं समाज प्रबंधन बोर्ड के चेयरमैन दीपक मालवीय बताते हैं कि उत्कलमणि गोपबंधु दास जी के नाम कई साहित्यिक कृतियां दर्ज हैं। सत्यवादी की जोरशोर से री-लांचिंग उत्कलमणि के ओडिया साहित्य में योगदान को श्रद्धांजलि है। ओडिया साहित्य में सत्यवादी युग जाना जाता है। बचपन से ही उनके भीतर कवित्व का लक्षण देखा गया। पढ़ाई के दौरान ही उनकी सरल और मर्मस्पर्शी भाषा में कविता लिखने की शैली की विधा की शुरुआत उन्हीं से हुई बतायी जाती है। साहित्य सृजन की उनकी अद्भुत शैली ने उन्हें ओडिया साहित्य के एक नये युग का सृष्टा के रूप में स्थापित किया। साहित्यिक पत्रिका सत्यवादी का प्रकाशन और मुद्रण समाज अखबार ही करता है। लोक सेवक मंडल के महासचिव तथा समाज के प्रकाशक एवं मुद्रक निरंजन रथ इस पत्रिका के संपादक हैं। उत्कलमणि के प्रति जनप्रेम के कारण भी ओडिया समाज में पत्रिका की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है। अवकाश चिंता, बंदीर आत्मकथा और धर्मपद ये रचनाएं एक उज्ज्वल ग्रंथ हैं। ओडिशावासी इसे पढ़ते राष्ट्रीयता के भाव से लबरेज हो जाते हैं। धर्मपद में तो कोर्णाक मंदिर के निर्माण पर लिखे गए वर्णन को पढ़कर ओडिया लोग विशेष गौरव का अनुभव करते हैं। यद्यपि ये सब छोटी-छोटी पुस्तकें हैं, तथापि इनका प्रभाव अनेक बृहद काव्यों से भी अधिक है।

(इनपुट के साथ)

 

 

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