आम चुनाव 2019ः महंगाई भी है विपक्ष का बड़ा मुद्दा

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(डेस्क) चुनाव नजदीक आते आते मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना विपक्षी दलों की रणनीति का हिस्सा रहा है। सत्ता चाहे किसी भी दल या गठबंधन की हो लेकिन महंगाई एक ऐसा मुद्दा है जो हर चुनाव में सिर पर चढ़कर बोलता है। अबकी भी कुछ ऐसा है। विपक्षी दल कांग्रेस ने महंगाई पर मोदी सरकार की आलोचना हुए कहा है कि उसने इन्टरनेशनल माहौल भारत के लिए अनुकूल होने के बाद भी मोदी सरकार ने महंगाई रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

2014 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन यूपीए की मनमोहन सरकार के खिलाफ महंगाई को बड़ा मुद्दा बनाया था। चुनाव प्रचार के दौरान सबसे पहले हिमाचल प्रदेश की रैली में महंगाई का मुद्दा छेड़ कर मोदी ने आम जनता की नब्ज टटोली थी। महंगाई की मार झेल रही जनता को मोदी ने महंगाई के मोर्चे पर अच्छे दिन लाने का भरोसा दिलाया तो मतदाताओं ने मोदी की झोली वोटों से भर दी। आम चुनाव में दस वर्ष पुरानी यूपीए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में महंगाई फैक्टर मोदी का सबसे कारगर ‘हथियार’ साबित हुआ था, लेकिन आज करीब साढ़े तीन वर्षों के बाद भी महंगाई डायन ही बनी हुई है। महंगाई नियंत्रण करने की नाकामी मोदी सरकार पर भारी पड़ती जा रही है। ऐसा लगता है कि अब तो जनता ने भी यह मान लिया है कि कम से कम महंगाई के मोर्चे पर मोदी और मनमोहन सरकार में ज्यादा अंतर नहीं है। बस, फर्क है तो इतना भर कि मनमोहन सरकार की नाकामी का ढि़ंढोरा भाजपा वालों ने ढोल−नगाड़े के साथ पीटा था, जबकि कांग्रेस और विपक्ष महंगाई को मुद्दा ही नहीं बना पा रहा है।

शायद यही वजह है कि जनता के बीच अब महंगाई पर चर्चा कम हो रही है। एक समय था जब प्याज या टमाटर के दाम में जरा सी भी वृद्धि होती थी तो भाजपा वाले पूरे देश में हाहाकार मचा देते थे, लेकिन आज हमारे नेतागण और तमाम बुद्धिजीवी मोदी सरकार को घेरने के लिये महंगाई को मुद्दा बनाने की बजाये साम्प्रदायिकता, विचारधारा की लड़ाई, राष्ट्रवाद की बहस में ही उलझे हुए हैं। हाल ही में टमाटर सौ रूपये किलो तक बिक गया, मगर यह सरकार के खिलाफ मुद्दा नहीं बन पाया। इसी प्रकार आजकल प्याज भी गृहणियों को रूला रहा है। पिछले वर्ष दाल के भाव आसमान छूने लगे थे, उड़द सहित कुछ अन्य दालें तो 200 रूपये किलो तक बिक गईं। गरीब की थाली से दाल गायब हुई, मगर विपक्ष गरीबों का दर्द नहीं बांट सका।

इन दिनों सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्वीटर आदि पर एक पुरानी तस्वीर वायरल हो रही है जिसमें दिखाया जा रहा है कि कांग्रेस के समय जब रसोई गैस के दाम बढ़ते थे तो किस तरह से भाजपा के नेता अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज आदि धरने पर बैठ जाते थे। अभी, रसोई गैस के दाम बढ़ते ही स्‍मृति ईरानी की पुरानी तस्वीर और ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे थे जिसमें वह मनमोहन सरकार के समय एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ने पर सिलेंडर को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करती नजर आ रही हैं, लेकिन कांग्रेस की तरफ से ऐसा नजारा नहीं देखने को मिलता है।

बीते साल अगस्त महीने की बात है केंद्र की मोदी सरकार ने बिना सब्सिडी वाले एलपीजी गैस सिलेंडर के दाम में 86 रुपये की बढ़ोतरी कर दी थी। सरकार ने इसके पीछे अंतर्राष्‍ट्रीय बाजार में एलपीजी के दाम बढ़ना वजह बताया। जो बिना−सब्सिडी वाला एलपीजी सिलेंडर 466.50 रुपए का था, उसके बाद से छह किस्तों में यह 271 रुपए यानी 58 प्रतिशत महंगा हो चुका है। तेल कंपनियों ने सब्सिडीशुदा रसोई गैस सिलेंडर का दाम भी मामूली 13 पैसे बढ़ाकर 434.93 रुपए प्रति सिलेंडर कर दिया। इससे पहले इसमें 9 पैसे की वृद्धि की गई। दो मामूली वृद्धि से पहले सब्सिडीशुदा गैस के दाम आठ बार बढ़े हैं और हर बार करीब दो रुपए की इसमें वृद्धि की गई। मगर कहीं कोई हाय−तौबा नहीं हुई। बात 2014 से आज तक बढ़ती महंगाई की कि जाये तो 26 मई 2014 को एक किलो आटा देश के विभिन्न शहरों में 17 से 43 रुपये के बीच मिल जाता था जबकि मई 2017 में आटे की कीमत 19 से 50 रुपये प्रतिकिलो के बीच है। चावल के दाम 20 से 40 रुपये की जगह 18 से 47 रुपये प्रति किलो हैं। अरहर की दाल पहले 61 से 86 रुपये प्रति किलो पर मिल रही थी जबकि अब ये कीमत 60 से 145 रुपये के बीच है। बीच में ये 200 रु. प्रतिकिलो तक जा पहुंची थी। 31 से 50 रुपये के बीच मिलने वाली चीनी अब 34 से 56 रुपये प्रतिकिलो मिल रही है। दूध की कीमत 25 से 46 रुपये से बढ़कर 28 से 62 रुपये प्रति लीटर है। यानि खाने पीने की प्रमुख वस्तुओं की महंगाई कम होने के बजाय बढ़ गई है।

 

हालांकि महंगाई का सरकारी आंकड़ा मनमोहन सरकार के मुकाबले राहत भरा है। मई 2014 में खुदरा महंगाई दर जहां 8.2 प्रतिशत के आसपास थी तो अप्रैल 2017 का आंकड़ा 2.99 प्रतिशत रहा। इसी तरह खाने पीने की चीजों की खुदरा महंगाई दर 8.89 फीसदी से घटकर 0.61 पर आ गई।  इसके अलावा फल, सब्जियों, मीट, मछली की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। ईंधन जनित महंगाई भी अगस्त में दोगुनी हो गई। जुलाई में फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में महंगाई दर 9.99 फीसद रही जो जुलाई 2016 में 4.37 फीसद पर थी। पेट्रोल और डीजल की लगातार बढ़ रहीं कीमतें और पावर टैरिफ में की गई बढ़ोतरी ही फ्यूल एंड पावर सेगमेंट में आई तेजी का असली कारण है।

महंगाई दर न्यूनतम होने का कारण है कि वर्ष 2014 के बाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम में कमी और गांव के लोगों की आमदनी में गिरावट आई। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि महंगाई कम करने का वादा करके सरकार सत्ता में आई थी। पर अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद महंगाई कम नहीं कर पायी। राहुल गांधी ने 2017 में महंगाई को लेकर केंद्र सरकार पर हल्ला बोला था। कहा था मोदी महंगाई पर नकेल कसें, या गद्दी छोड़ें। जबकि मोदी कहते रहे कि भारत में महंगाई दर दशकों में अब अपने न्यूनतम स्तर पर है।

उसी साल सरकारी समिति ने सिफारिश की थी कि महंगाई दर चार प्रतिशत या इस आंकड़ें से 2 प्वाइंट इधर-उधर हो, इसे फ्लेक्सिबिल इन्फ्लेशन टार्गेटिंग कहा जाता है। आम लोग महंगाई का गुणाभाग नहीं समझ पाते। साल 2010 में जब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी तब महंगाई दर क़रीब 12 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा साल 2014 में सत्ता में आई। इस सरकार के कार्यकाल में महंगाई दर बेहद कम रही है। साल 2017 में औसत महंगाई दर तीन प्रतिशत से थोड़ा ही ज़्यादा थी।

कैसे पता चलता है महंगाई का

भारत जैसे विशाल और विविध देश में महंगाई दर का पता लगाना बेहद मुश्किल है। महंगाई दर जानने के लिए अधिकारी थोक बाज़ार पर नज़र रखते हैं लेकिन साल 2014 में केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स यानि सीपीआई का इस्तेमाल तय किया। सीपीआई यानि घरों में खपत होने वाले सामान और सेवाओं का दाम, या आसान भाषा में कहें रीटेल प्राइसेज़। सीपीआई का आधार एक सर्वे होता है जिसमें सामान और सेवाओं पर आंकड़े जुटाए जाते हैं। इस सर्वे में खाद्य के अलावा दूसरी बातों जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी जानकारी जुटाई जाती है। ऐसा दूसरे देशों में भी किया जाता है, हालांकि सामान की संख्या, सीपीआई के आंकलन का तरीक़ा अलग होता है.

महंगाई दर कम क्यों

साल 2011 में जब कांग्रेस सत्ता में थी तब कच्चे तेल का दाम $120 (£90) प्रति बैरल था। अप्रेल 2016 तक आते-आते कच्चे तेल का दाम $40 प्रति बैरल तक पहुंच गया।  हालांकि अगले दो सालों में इसमें एक बार फिर उछाल दर्ज किया गया। लेकिन अर्थव्यवस्था के दूसरे पहलू भी हैं जिनका महंगाई दर पर असर पड़ता है। एक महत्वपूर्ण कारण है ग्रामीण इलाकों में खाद्य सामान के घटते दाम।. भारत के 60 प्रतिशत से ज़्यादा लोग ग्रामीण इलाक़ों में रहते हैं। भारत के पूर्व प्रमुख स्टैटिशियन प्रनब सेन के मुताबिक़ पिछले कुछ सालों में खेती से होने वाली कमाई में कमी भी महंगाई दर में गिरावट का कारण है। इसके साथ ही यह है कि ग्रामीण इलाक़ों में आमदनी की गारंटी देने वाली योजनाओं की आर्थिक मदद में कमी, सरकार द्वारा किसानों को फ़सल की ख़रीद के दाम में न्यूनतम बढ़ोत्तरी। प्रनब सेन कहते हैं  कि पिछले आठ से दस सालों के (कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के) शासनकाल में ग्रामीण रोज़गार योजनाओं के कारण लोगों की कमाई में बढ़ोत्तरी हुई थी। जिससे खाद्य सामान पर ख़र्च में भी तेज़ी आई थी। लेकिन उनका कहना है कि मेहनताने में वो बढ़ोत्तरी अब कम हो गईहै। इस कारण मांग में कमी आई है, और महंगाई दर में भी।.महंगाई दर में कमी के लिए आरबीआई के नीति आधारित फ़ैसले भी ज़िम्मेदार हैं। पिछले कुछ वक़्त से आरबीआई ने ब्याज दर में कमी से गुरेज़ किया था। फ़रवरी में घोषित ब्याज दर में कमी पिछले 18 महीनों में पहली बार थी। ब्याज दर में कमी का मतलब है सिस्टम में ज़्यादा धन, लोगों के पास ज़्यादा पैसा यानि ज़्यादा ख़र्च और महंगाई दर के ऊपर जाने की संभावना। सरकार की कोशिश है वित्तीय घाटे को क़ाबू में रखा जाए। कम वित्तीय घाटे से महंगाई दर को क़ाबू में रखने में मदद मिलती है।

(इनपुटःबीबीसी)

 

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