अभिव्यक्ति की आजादी में वकीलों की भूमिका अहम

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अधिकार संपन्न प्रेस आयोग के गठन की आवश्यकता

सुप्रीमकोर्ट की हालिया व्यवस्था पत्रकारों के हित में

भुवनेश्वर 12 अप्रैल। अभिव्यक्ति की आजादी होने के बाद भी मीडिया पर कानूनी शिकंजा बढ़ता जा रहा है। ऐसे में वकीलों को मीडिया की मदद के लिए आगे आना होगा। अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा वकीलों की मदद से ही संभव है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अभिव्यक्ति की आजादी को अक्षुण्ण रखना होगा। मीडिया के खिलाफ मानहानि दावों पर सुप्रीमकोर्ट की हालिया व्यवस्था उदारवादी होने से पत्रकारों की हौसलाआफजायी हुई है फिर भी खोजपूर्ण रपटों में एहतियात बरतना जरूरी है।

ओडिशा प्रेस क्लब में आयोजित जर्नलिस्ट कांफ्रेंस में वक्ताओं ने कहा कि देश में एक संवैधानिक स्टेटस वाला प्रभावशाली प्रेस आयोग के गठन की आवश्यकता है। निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ पत्रकारिता में यदि थोड़ी बहुत भूलचूक हो भी जाए तो वादी को सहनशीलता का परिचय देते हुए अनदेखी कर देना चाहिए। पर लोग कोर्ट में मानहानि की नोटिस भिजवाकर मीडिया को धमकाने का कुत्सित प्रयास करते हैं। लीगल सर्विस इंस्टीट्यूट ने पत्रकारों को पेशेगत मामलों में मुफ्त विधिक राय देने की घोषणा की है।

ओडिशा प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकारों के सम्मेलन में इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष विकास दास ने कहा कि संस्था यह कार्य पहले से कर रही है। अनेक राज्यों में ऐसे मामले लड़े जा रहे हैं। दास ने कहा कि मीडिया से संबंधित कानूनी मामले और उनसे उत्पन्न पत्रकारों के समक्ष चुनौतियों के कारण ऐसे मंथन वाले कार्यक्रम आयोजित किए जाने की जरूरत है। विकास दास ने कहा कि अब तो प्रिंट, चैनल, डिजिटल मीडिया का युग है। बेहतर कंटेंट वाली खबरें देने का पत्रकारों पर दबाव रहता है, ऊपर से मानहानि की धमकी पत्रकारों की परेशानी का सबब है। उन्हें कानूनी मुश्किलात से निकालने को वकीलों को आगे आना होगा।

वरिष्ठ पत्रकार अरुण पंडा ने अदालती चुनौतियों वाले अपने अनुभव साझा किए। जस्टिस (रि) एएस नायडू, उदयबल्लभ दास, विधि विशेषज्ञ प्रदीप कुमार सरकार, बीबीसी के संदीप साहू, स्निग्धा पाणिग्रही, पैट्रिक रोगन व सोफी पोलक, शुभाश्री दास आदि ने भी विचार व्यक्त किए।

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